करीब 86 साल से फाइलों, सर्वेक्षणों और राज्यों के बीच सहमति की कवायद में उलझी किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना अब अपने सबसे अहम पड़ाव पर पहुंच गई है। मंगलवार को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने किशाऊ परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए। लंबे समय से अटकी इस परियोजना के लिए छह राज्यों के बीच औपचारिक सहमति बनना निर्माण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। तीन महीने पहले भी किशाऊ परियोजना को लेकर नई दिल्ली में महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। उस बैठक में परियोजना के जल घटक की लागत और राज्यों के बीच हिस्सेदारी को लेकर सहमति बनने के बाद MoU की प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर सहमति बनी थी। अब उसी सहमति को आगे बढ़ाते हुए छह राज्यों ने औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। आज की बैठक में क्या हुआ? किशाऊ परियोजना समझौते पर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। बैठक केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हुई। परियोजना से जुड़े राज्यों के बीच लंबे समय से लागत साझेदारी, पानी के बंटवारे और बिजली से मिलने वाले लाभ को लेकर सहमति का इंतजार था। समझौते के बाद इन मुद्दों पर आगे की प्रक्रिया के लिए एक स्पष्ट ढांचा तैयार हो गया है। जल घटक की 90 फीसदी लागत केंद्र उठाएगा पिछली बैठक में परियोजना को आगे बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण सहमति जल घटक की लागत को लेकर बन गई थी। उस तय व्यवस्था के अनुसार जल घटक की कुल लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगी। बाकी 10 प्रतिशत लागत छह राज्यों के बीच साझा की जाएगी। इस व्यवस्था से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश पर परियोजना के जल घटक की लागत का बड़ा बोझ नहीं आएगा। दोनों राज्य परियोजना के बिजली घटक और अन्य लाभों से जुड़े प्रावधानों के तहत हिस्सेदारी रखेंगे। हिमाचल की हिस्सेदारी के बदले दिल्ली और राजस्थान को पानी परियोजना के विद्युत घटक की लागत में हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी को लेकर भी महत्वपूर्ण व्यवस्था की गई। इसके बदले हिमाचल प्रदेश को आवंटित पानी के हिस्से में से दिल्ली और राजस्थान को पानी उपलब्ध कराया जाएगा। केंद्र सरकार इस व्यवस्था को यमुना में स्वच्छ जल प्रवाह बढ़ाने और यमुना पुनर्जीवन की कोशिशों के लिहाज से महत्वपूर्ण मान रही है। परियोजना पूरी होने के बाद यमुना बेसिन में पानी की उपलब्धता और उसके नियोजित इस्तेमाल को बेहतर बनाने की उम्मीद है। उत्तराखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण है किशाऊ? उत्तराखंड के लिए किशाऊ परियोजना सिर्फ एक बांध परियोजना नहीं है। यह राज्य की ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ टोंस और यमुना बेसिन के जल प्रबंधन से भी जुड़ी है। परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर प्रस्तावित है। टोंस यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। प्रस्तावित बांध से जलविद्युत उत्पादन के साथ सिंचाई, पेयजल, बाढ़ नियंत्रण और यमुना में पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखने का लक्ष्य है। कई राज्यों को मिलेगा पानी किशाऊ परियोजना के जरिए यमुना बेसिन के पानी को विभिन्न राज्यों के बीच बांटने की योजना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत हरियाणा को 836 क्यूसेक, उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी मिलने का प्रावधान है। यही वजह है कि परियोजना को केवल उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं माना जाता। इसका सीधा संबंध दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों की दीर्घकालिक जल जरूरतों से है। करीब 15 हजार करोड़ तक पहुंची लागत परियोजना के दशकों तक लंबित रहने का असर इसकी लागत पर भी पड़ा है। वर्ष 2018 में किशाऊ परियोजना की अनुमानित लागत करीब 11,550 करोड़ रुपये आंकी गई थी। निर्माण लागत में बढ़ोतरी और समय बीतने के साथ अब परियोजना की अनुमानित लागत करीब 15 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। ऐसे में समझौते के बाद परियोजना को जल्द आगे बढ़ाना आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि देरी के साथ इसकी लागत और बढ़ सकती है। 1940 में पहली बार आया था विचार किशाऊ परियोजना का इतिहास करीब 86 साल पुराना है। वर्ष 1940 में ब्रिटिश शासन के दौरान पहली बार यहां बड़े बांध की परिकल्पना की गई थी। इसके बाद तत्कालीन पंजाब सरकार ने 1944-45 में परियोजना क्षेत्र का सर्वेक्षण कराया। शुरुआती अध्ययन में बड़े जलाशय की संभावना सामने आई, लेकिन 1946 में प्रशासनिक और तकनीकी कारणों से सर्वेक्षण रोक दिया गया। इसके बाद 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने परियोजना को फिर से आगे बढ़ाने की कोशिश की। 1964 में प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई और करीब 235 मीटर ऊंचे बांध का प्रस्ताव रखा गया। फॉल्ट लाइन के कारण बदलना पड़ा बांध स्थल परियोजना को आगे बढ़ाने के दौरान प्रस्तावित मूल बांध स्थल पर बड़ी भू-वैज्ञानिक समस्या सामने आई। जांच में क्षेत्र के प्रमुख फॉल्ट लाइन पर होने की बात सामने आई, जिसके बाद बांध की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हुए। केंद्रीय जल आयोग की समीक्षा के बाद वैकल्पिक डिजाइन और नए स्थलों पर अध्ययन शुरू हुआ। अटल, सांबरखेड़ा और मोहराड़ जैसे स्थानों का अध्ययन किया गया। विस्तृत भू-वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद सांबरखेड़ा को बड़े बांध के लिए अधिक उपयुक्त माना गया। इसी आधार पर बाद में नई डीपीआर तैयार की गई। वर्ष 1988 में डीपीआर बनी और संशोधनों के बाद 1998 में इसे फिर केंद्रीय जल आयोग के सामने भेजा गया। लेकिन पर्यावरणीय मंजूरी, पुनर्वास, लागत और राज्यों के बीच सहमति जैसे सवाल परियोजना की राह में बने रहे। 2008 में राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा, फिर भी नहीं शुरू हुआ निर्माण वर्ष 2008 में किशाऊ परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया गया। इससे परियोजना को आगे बढ़ने की उम्मीद जगी, लेकिन इसके बावजूद निर्माण शुरू नहीं हो सका। लागत साझेदारी, बिजली और पानी में हिस्सेदारी, पर्यावरणीय मंजूरी और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास जैसे मुद्दे लगातार परियोजना की राह में बाधा बने रहे। 2014 के बाद फिर तेज हुई प्रक्रिया 13 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई बैठक के बाद परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया ने नई गति पकड़ी। इसके बाद उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच संयुक्त उपक्रम बनाने की दिशा में काम हुआ। 16 जनवरी 2017 को किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी KCL का गठन उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के 50:50 संयुक्त उपक्रम के रूप में किया गया। कंपनी को परियोजना से जुड़ी डीपीआर, तकनीकी अध्ययन और क्रियान्वयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई। अब अगला पड़ाव क्या? छह राज्यों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद किशाऊ परियोजना के लिए सबसे बड़ी अड़चनों में से एक दूर हो गई है। अब परियोजना से जुड़ी बाकी वैधानिक, तकनीकी, पर्यावरणीय और प्रशासनिक मंजूरियों की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। यदि केंद्रीय स्तर पर आवश्यक मंजूरियां मिलती हैं तो करीब 86 साल से कागजों में घूम रही किशाऊ परियोजना के निर्माण का रास्ता वास्तव में खुल सकता है। विस्थापन की चुनौती भी बड़ी किशाऊ परियोजना के साथ विकास और जल सुरक्षा की उम्मीदें हैं, लेकिन इसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। परियोजना के कारण उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कई गांव प्रभावित होंगे और बड़ी संख्या में परिवारों के विस्थापन की चुनौती सामने आएगी। परियोजना के लिए उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की बड़ी मात्रा में भूमि का इस्तेमाल प्रस्तावित है। प्रभावित परिवारों के मुआवजे, पुनर्वास और आजीविका से जुड़े सवाल निर्माण शुरू होने से पहले महत्वपूर्ण रहेंगे। ——————- यह भी पढ़ें उत्तराखंड-हिमाचल के 17 गांव डूबेंगे तो 6 राज्यों को फायदा:किशाऊ परियोजना पर बनी सहमति, अब कैबिनेट मंजूरी का इंतजार करीब 86 साल से फाइलों और बैठकों के बीच अटकी किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना अब अपने सबसे अहम पड़ाव पर पहुंच गई है। वर्षों से जल बंटवारे, लागत साझेदारी और राज्यों के बीच सहमति जैसे मुद्दों में उलझी यह परियोजना आखिरकार आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। सकी पहली परिकल्पना वर्ष 1940 में ब्रिटिश शासन के दौरान की गई थी। इसके बाद तत्कालीन पंजाब सरकार ने 1944-45 में परियोजना क्षेत्र का सर्वेक्षण कराया। (पढ़ें पूरी खबर)

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