मैदानी राज्यों के मुकाबले हिमाचल में मौसम अभी कुछ ठंडा है, लेकिन मई के दूसरे हफ्ते में लोकसभा चुनाव के लिए नॉमिनेशन की प्रक्रिया पूरी होते-होते यहां सियासी पारा चढ़ना शुरू हो गया है। वर्ष 2014 और 2019 की मोदी लहर में हिमाचल की चारों सीटें जीतने वाली BJP इस बार भी क्लीन स्वीप कर हैट्रिक लगाने का दावा कर रही है। हालांकि ग्राउंड जीरो के हालात थोड़ा अलग संकेत दे रहे हैं। जिससे लगता है इस बार भगवा पार्टी के लिए मुकाबला इतना आसान नहीं रहने वाला। हर बार की तरह इस बार भी हिमाचल में चुनावी मुकाबला BJP और कांग्रेस के बीच हो रहा है। दोनों के बीच यहां कोई थर्ड प्लेयर नहीं है। कांग्रेस की तैयारियां पिछले 2 आम चुनाव के मुकाबले इस बार अच्छी दिख रही हैं। इसकी बड़ी वजह है, प्रदेश में तकरीबन डेढ़ साल से उसकी अपनी सरकार होना। CM सुखविंदर सिंह सुक्खू की अगुवाई वाली राज्य सरकार का साढ़े 3 साल का कार्यकाल शेष है, इसलिए फिलहाल एंटी इनकंबेंसी जैसा कुछ नहीं दिखता। कुल मिला कर हवा का रुख तो यह बता रहा है कि इस बार कांग्रेस के पास BJP की हैट्रिक रोकने का पूरा मौका है। 10 साल बाद आम चुनाव में लोकसभा सीट जीतकर अपना खाता खोलने का ये सुनहरा मौका है। अब वह इसे कितना भुना पाती है? ये देखना होगा? BJP के लिए सेल्फ गोल भी साबित हो सकती है विधायकों की तोड़-फोड़
हिमाचल के लोग साफ-सुथरी राजनीति में विश्वास रखते हैं। पिछले कुछ महीनों के दौरान प्रदेश में जो सियासी उठापटक देखने को मिली, इसे यहां के मतदाता खासे नाखुश है। राज्यसभा की एक सीट के लिए पोलिंग में 6 कांग्रेसी विधायकों ने पहले BJP कैंडिडेट हर्ष महाजन के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर दी। वह यहीं नहीं थमे, बल्कि पार्टी व्हिप के बावजूद विधानसभा में बजट पास करते समय सदन से गायब हो गए। यहां के मतदाताओं का कहना है कि ऐसा कर कांग्रेस के बागी विधायकों ने BJP की प्लानिंग के अनुसार काम किया। कोशिश थी कि बजट पास न करवा पाने की स्थिति में राज्य सरकार खुद ही गिर जाएगी, लेकिन CM और उनके रणनीतिकारों ने किसी तरह इस संकट से निकलने में कामयाब हो गए। इसके बाद कांग्रेस, खासकर CM सुक्खू ने बागी विधायकों पर कोई रियायत नहीं बरती और डिसिप्लिनरी एक्शन लेते हुए उन्हें पार्टी से निकाल दिया। सरकार की याचिका पर महज 48 घंटे में स्पीकर ने सभी 6 बाकी MLA की विधानसभा सदस्यता भी रद्द कर दी। अब इनकी खाली विधानसभा सीटों पर लोकसभा चुनाव के साथ उपचुनाव होने का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है, क्योंकि इस पूरे घटनाक्रम को देखने वाले आम हिमाचली का सेंटीमेंट कांग्रेस, खासकर CM के साथ नजर आ रहा है। लोगों के गुस्से का खमियाजा BJP के लोकसभा कैंडिडेट्स को उठाना पड़ सकता है। पोलिंग से 3 हफ्ते पहले लग रहा है कि ये पूरा एपिसोड BJP के लिए सेल्फ गोल भी साबित हो सकता है। ऐसा हुआ तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान पूर्व CM जयराम ठाकुर को हो सकता है। बड़े चेहरों को टिकट देने से कांग्रेस कैडर में अच्छा मैसेज
कांग्रेस ने बेशक BJP के मुकाबले अपने उम्मीदवारों का ऐलान देरी से किया लेकिन उसने जिन चेहरों पर दांव लगाया है, उन्हें मजबूत माना जा सकता है। मंडी लोकसभा सीट पर पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर विक्रमादित्य सिंह, शिमला सीट पर कसौली के MLA विनोद सुल्तानपुरी और कांगड़ा संसदीय क्षेत्र से पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा को टिकट देकर कांग्रेस हाईकमान अपने कैडर को BJP के सामने पूरे दम-खम से लड़ाई लड़ने का मैसेज देने में कामयाब रहा है। अपने विधायकों के दलबदल से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में नाराजगी है और वह BJP को सबक सिखाने के मूड में दिखता है। पार्टी को कैडर की ये नाराजगी पोलिंग निपटने तक सही दिशा में चैनलाइज रखनी होगी। मोदी फैक्टर कायम, हमीरपुर सेफ सीट
हिमाचल में उत्तर भारत के बाकी राज्यों के मुकाबले मोदी फैक्टर अधिक नजर आता है। यहां राम मंदिर की बात भी हो रही है जो BJP के लिए प्लस पॉइंट है। चारों लोकसभा सीटों में से हमीरपुर फिलहाल BJP के लिए सबसे सेफ मानी जा सकती है। वैसे हमीरपुर CM सुखविंदर सिंह सुक्खू का गृह जिला है और वह अपने करीबी सतपाल रायजादा को यहां से टिकट दिलाने में कामयाब रहे हैं। इस नाते सुक्खू की साख दांव पर लगी है, लेकिन फिलहाल यहां BJP कैंडिडेट और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को ऐज नजर आ रहा है। हमीरपुर के मुकाबले मंडी, शिमला और कांगड़ा सीट पर भगवा पार्टी को ज्यादा पसीना बहाना पड़ रहा है। सुक्खू के सामने खुद को साबित करने की चुनौती
विधायकों के दलबदल वाले एपिसोड के बाद अब CM सुखविंदर सिंह सुक्खू के सामने खुद को चुनाव में साबित करने की चुनौती है। हाईकमान ने टिकट बंटवारे में उनकी पसंद को तरजीह दी है। शिमला-हमीरपुर के उम्मीदवार CM के करीबी हैं और अब यहां कांग्रेस का प्रदर्शन सुधारने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई है। अगर पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा तो सरकार के साथ-साथ संगठन पर उनकी पकड़ मजबूत होगी और वह आगे खुलकर काम कर सकेंगे। ऐसा न होने की सूरत में विरोधियों को उन्हें घेरने का मौका मिल जाएगा। वीरभद्र फैमिली के लिए डू एंड डाई वाला चुनावी रण
ये लोकसभा चुनाव पूर्व CM स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के परिवार और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी विक्रमादित्य सिंह के लिए जीने-मरने की लड़ाई जैसा है। हिमाचल में कांग्रेस की पूरी राजनीति लंबे समय तक हॉलीलॉज (शिमला में वीरभद्र सिंह का निजी आवास) से ड्राइव होती रही है, लेकिन 8 जुलाई 2021 को वीरभद्र सिंह के निधन के बाद काफी कुछ बदल गया है। वीरभद्र सिंह के बाद उनकी लिगेसी को आगे बढ़ाने का जिम्मा उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे विक्रमादित्य सिंह के कंधों पर आ गया है। मां-बेटा कोशिश कर रहे हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में पूर्व बहुमत के बावजूद CM की कुर्सी हाथ से निकल जाने और उसके बाद विधायकों के दलबदल प्रकरण ने तगड़ा सेटबैक दिया। इसकी वजह से वीरभद्र समर्थकों में कहीं न कहीं थोड़ी-बहुत हताशा है। विक्रमादित्य सिंह को मंडी का चुनावी रण जीतकर साबित करना होगा कि पहाड़ों पर उन्हें चूका हुआ मान लेना जल्दबाजी होगी। उनके लिए यह चुनाव हॉलीलॉज का अस्तित्व बचाए रखने जैसा है। सरकार का ओवरऑल कामकाज संतोषजनक
वर्ष 2022 के हिमाचल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने BJP को सत्ता से बाहर कर सरकार बनाई। उसकी सरकार को सिर्फ डेढ़ साल हुआ है और साढ़े 3 साल का कार्यकाल शेष है। इसके चलते लोगों में खास नाराजगी नहीं दिखती। 2023 की प्राकृतिक आपदा के बाद सरकार के लेवल पर जिस तरह डिजास्टर मैनेजमेंट का काम हुआ, उसे अधिकतर लोग अच्छा बताते हैं। हालांकि मुआवजे में बंदरबांट के आरोप कांग्रेसी नेताओं पर लगे हैं। इसके बावजूद सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी नहीं है। अधूरे वादे पूरे करने होंगे
कांग्रेस ने 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आई तो हिमाचल में 18 साल से अधिक उम्र की हर महिला को हर महीने 1500 रुपए दिए जाएंगे। हर साल 1 लाख सरकारी नौकरियां देने का प्रॉमिस भी कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने किया था। सुक्खू सरकार ने 25 फरवरी, 2024 को महिलाओं को ₹1500 की मासिक पेंशन देने के लिए इंदिरा गांधी प्यारी बहना सम्मान निधि योजना शुरू कर दी। इसकी शुरुआत लाहौल-स्पीति से की गई। सरकार का दावा है कि राज्य की लगभग ढाई लाख महिलाओं को इस स्कीम का लाभ मिलेगा। हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग (HPSSC) का पुनर्गठन न हो पाने के कारण सरकारी भर्तियां लटकी पड़ी हैं। अफसरशाही बेलगाम है। प्रदेश को आर्थिक संकट से निकालने की चुनौती भी सरकार के सामने है। वरिष्ठ पत्रकार बोले- गुलाटी मारने वालों को पसंद नहीं करती जनता
वरिष्ठ पत्रकार डीसी यादव ने कहा फिलहाल तो लगता नहीं है कि हिमाचल में बीजेपी में चारों सीटें जीतने की क्षमता है। हां इतना जरूर है कि हमीरपुर सीट इनके लिए सेफ मानी जा सकती है। अभी हाल ही में हुई सियासी उठापटक का असर 6 विधानसभा सीटों पर हो रहे उप-चुनाव में देखने को मिलेगा। यहां के मतदाता गुलाटी मारने वालों को पसंद नहीं करते हैं। हिमाचल कांग्रेस में गुटबाजी है, लेकिन उसके बावजूद सरकार अच्छा काम कर रही है। इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा। बीजेपी में मंडी सीट की कैंडिडेट को छोड़कर बाकी सभी ठीक हैं। वहीं कांग्रेस में हमीरपुर के कैंडिडेट को छोड़कर, बाकी सभी टक्कर देने वाले हैं।