हिमाचल हाईकोर्ट ने चंबा के एक मामले में नाबालिग पत्नी के बच्चे को जन्म देने पर पति के खिलाफ दर्ज पॉक्सो एक्ट का केस रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अस्पताल में नाबालिग लड़की की डिलीवरी होने की सूचना मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि उसके साथ यौन अपराध हुआ है। डॉक्टर ने पुलिस को सिर्फ डिलीवरी की जानकारी दी थी, लड़की ने यौन उत्पीड़न की कोई शिकायत नहीं की थी। जस्टिस चिराग भानु सिंह की बैंच ने कहा कि ऐसे मामले में बाल विवाद से जुड़ा अपराध बनता है तो बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है। दरअसल, यह मामला 3 दिसंबर 2024 का है। चाइल्ड वेलफेयर हेल्पलाइन के समन्वयक ने पुलिस को सूचना दी थी कि एक नाबालिग लड़की को चंबा अस्पताल में डिलीवरी के लिए लाया गया है। इसके बाद महिला पुलिस थाना चंबा में जितेंद्र कुमार, उसके माता-पिता और बहन के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय दंड संहिता (IPC) और पॉक्सो एक्ट की धाराएं लगाई गई। याचिकाकर्ता बोला- दोनों परिवारों की सहमति से शादी हाईकोर्ट में याचिका दायर कर जितेंद्र कुमार ने बताया कि उसने लड़की से वर्ष 2024 में उसके और अपने परिवार की सहमति से शादी की थी। दोनों साथ रह रहे थे और उनके घर बच्चे का जन्म हुआ। लड़की और उसके पति ने अदालत में पेश होकर कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से शादी की है और अब वे इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। दोनों ने समझौता भी कर लिया था। डॉक्टर ने यौन अपराध की शिकायत नहीं की अदालत ने मामले के रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि FIR मुख्य रूप से डॉक्टर की रिपोर्ट के आधार पर दर्ज हुई थी, जबकि डॉक्टर ने पुलिस को केवल यह बताया था कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की ने अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया है। लड़की ने डॉक्टर के सामने अपने साथ किसी यौन अपराध की शिकायत नहीं की थी। यौन अपराध की जानकारी पुलिस को देना जरूरी: कोर्ट कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट की धारा 19 के तहत यौन अपराध होने या इसकी आशंका की जानकारी पुलिस को देना जरूरी है। इस प्रावधान का उद्देश्य बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों को सामने लाना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि बच्चे को जन्म देने के लिए अस्पताल पहुंची हर नाबालिग लड़की के मामले में अपने आप पॉक्सो एक्ट लगा दिया जाए। निचली अदालतों को भी मामलों पर विचार करना चाहिए हाईकोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कई बार मुकदमे की सुनवाई के दौरान परिस्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन निचली अदालतें इन पर उचित स्तर पर विचार नहीं करतीं। ऐसे में आरोपियों को राहत के लिए हाईकोर्ट का रुख करना पड़ता है और इस तरह की याचिकाओं की संख्या बढ़ती है। अदालत ने कहा कि यदि मुकदमे के दौरान पत्नी अदालत में गवाही देकर स्पष्ट कर देती है कि वह आरोपी की विवाहित पत्नी है और अभियोजन पक्ष के पास अपराध साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, तो निचली अदालतें भी कानून के तहत आरोपी को बरी कर सकती हैं। इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी, मानसिक परेशानी और अदालतों का समय बचाया जा सकता है। अदालत ने माना कि इस मामले में पत्नी की गवाही से अभियोजन पक्ष के आरोपों का आधार समाप्त हो गया है और आरोपियों को दोषी ठहराए जाने की संभावना नहीं है। ऐसे में मुकदमे को जारी रखना उचित नहीं होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने FIR और इससे जुड़ी सभी कानूनी कार्यवाही रद्द करने के आदेश दिए।