हिमाचल हाईकोर्ट ने कोटखाई ड्रग्स मामले में बरी हो चुके पूर्व हेड कांस्टेबल दिनेश कुमार को पुलिस सेवा में बहाल करने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि जिस आपराधिक मामले में सजा के आधार पर उन्हें नौकरी से बर्खास्त किया गया था, उसमें वह हाईकोर्ट से बरी हो चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट भी सरकार की चुनौती खारिज कर चुका है। ऐसे में उनकी बर्खास्तगी को जारी नहीं रखा जा सकता। जस्टिस ज्योत्सना रिवाल दुआ ने सरकार और पुलिस विभाग को दिनेश कुमार को चार सप्ताह के भीतर सेवा में बहाल करने के निर्देश दिए हैं। बहाली के साथ ही दिनेश को जुलाई 2018 से अब तक की बर्खास्तगी अवधि का 50% वेतन एरियर, सीनियोरिटी, नोशनल प्रमोशन और अन्य सेवा लाभ देने को भी कहा। दरअसल, दिनेश कुमार वर्ष 1997 में हिमाचल पुलिस में कांस्टेबल भर्ती हुए थे। वर्ष 2011 में उन्हें हेड कांस्टेबल बनाया गया। जनवरी 2016 में कोटखाई पुलिस स्टेशन में उनके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ। इसके बाद शिमला की स्पेशल जज (फॉरेस्ट) अदालत ने अप्रैल 2018 में उन्हें दोषी ठहराते हुए 14 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। सजा के बाद पुलिस ने नौकरी से निकाल दिया निचली अदालत से सजा होने के बाद पुलिस विभाग ने जुलाई 2018 में दिनेश कुमार को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। उनके खिलाफ चल रही विभागीय जांच भी बंद कर दी गई। विभाग का कहना था कि जब अदालत उन्हें सजा सुना चुकी है, तो अलग से विभागीय जांच जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत दिनेश कुमार ने निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। अक्टूबर 2023 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने निचली अदालत का फैसला पलट दिया और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया। सरकार सुप्रीम कोर्ट गई, वहां भी अपील खारिज हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ हिमाचल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की। जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद दिनेश कुमार की ओर से पुलिस विभाग में दोबारा नौकरी पर बहाली के लिए आवेदन किया गया। पुलिस ने बहाली से क्यों किया इनकार? शिमला के तत्कालीन एसपी ने अगस्त 2025 में दिनेश कुमार की बहाली की अर्जी खारिज कर दी। आदेश में कहा गया कि भले ही वह अदालत से बरी हो गए हैं, लेकिन विभागीय जांच में उनके खिलाफ मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल होने के सबूत मिले थे। दिनेश कुमार ने इस फैसले को फिर हाईकोर्ट में चुनौती दी हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर क्या पाया? हाईकोर्ट ने मामले का रिकॉर्ड देखा तो पाया कि पुलिस विभाग ने खुद जुलाई 2018 में विभागीय जांच बंद करने का लिखित आदेश जारी किया था। इसके बाद दिनेश कुमार के खिलाफ कोई विभागीय जांच आगे नहीं चली। न कोई सबूत दर्ज हुआ, न गवाही हुई और न ही विभागीय स्तर पर कोई निष्कर्ष निकाला गया। ऐसे में कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब विभागीय जांच 2018 में ही बंद कर दी गई थी, तो बाद में पुलिस ने यह कैसे कहा कि उस जांच में दिनेश कुमार के खिलाफ मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल होने के सबूत मिले थे। कोर्ट ने ‘संदेह का लाभ’ वाली बात पर क्या कहा? हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के बरी होने के फैसले में अगर ‘संदेह का लाभ’ जैसे शब्द इस्तेमाल हुए हैं, तो इससे उसकी बेगुनाही खत्म नहीं हो जाती। कोर्ट ने कहा कि दिनेश कुमार की बर्खास्तगी का मुख्य आधार निचली अदालत की सजा थी। जब हाईकोर्ट ने वह सजा रद्द कर दी और उन्हें बरी कर दिया तथा सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार की चुनौती खारिज कर दी, तो बर्खास्तगी का आधार ही खत्म हो गया। अब क्या होगा? हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार पुलिस विभाग को दिनेश कुमार को चार सप्ताह के भीतर दोबारा सेवा में लेना होगा। उन्हें जुलाई 2018 से अब तक की अवधि का 50% वेतन एरियर, वरिष्ठता का लाभ, नोशनल प्रमोशन और अन्य वित्तीय/सेवा लाभ देने होंगे। यानी करीब 8 साल से अधिक समय तक नौकरी से बाहर रहने के बाद अब दिनेश कुमार की पुलिस सेवा में वापसी का रास्ता साफ हो गया है।