विश्व क्षय रोग दिवस पर धर्मशाला में आयोजित कार्यशाला में टीबी चैंपियंस ने अपने अनुभव साझा किए। अंतिमा गुलेरिया और नीना देवी जैसी महिलाओं ने न केवल इस गंभीर बीमारी को हराया, बल्कि अब ‘निक्षय मित्र’ बनकर दूसरों को जागरूक कर रही हैं। जिला कांगड़ा मुख्यालय धर्मशाला में हुई इस मीडिया कार्यशाला में मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. विवेक कड़ोल सहित डॉ. राजेश सूद, एडिटर नवनीत शर्मा, विजय कुमार और विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधि डॉ. निकेत शामिल हुए। विशेषज्ञों ने टीबी मुक्त भारत के संकल्प को दोहराते हुए आधुनिक उपचार तकनीकों और सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया। स्पाइन टीबी का पता चलने पर टूट गई थीं अंतिमा गुलेरिया कार्यशाला में टीबी चैंपियन अंतिमा गुलेरिया ने बताया कि 2017 में उन्हें स्पाइन टीबी का पता चला था, जिससे वे अंदर से टूट गई थीं। शुरुआती दौर में उन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना भी करना पड़ा, लेकिन परिवार के सहयोग और अस्पताल के आत्मीय वातावरण ने उन्हें नई जिंदगी दी। स्वस्थ होने के बाद अंतिमा ने अपने गांव और आसपास के क्षेत्रों में टीबी रोगियों की पहचान कर उनकी मदद करना शुरू किया। जिले में प्रतिवर्ष 2,500 से अधिक टीबी रोगियों का पंजीकरण इसी तरह नगरोटा बगवां की चैंपियन नीना देवी ने साझा किया कि 2019 में टीबी से उबरने के बाद उन्हें ‘निक्षय मित्र’ योजना की जानकारी मिली। तब से वे लगातार समुदाय के बीच जाकर लोगों को टीबी के प्रति जागरूक कर रही हैं। वर्तमान में जिला कांगड़ा में टीबी उन्मूलन के लिए ठोस प्रयास किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, जिले में प्रतिवर्ष लगभग 2,500 से अधिक टीबी रोगियों का पंजीकरण होता है, जिन्हें बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं। जिले के सभी स्वास्थ्य केंद्रों में टीबी की जांच और दवाइयां पूरी तरह मुफ्त उपलब्ध हैं। मरीजों काे प्रतिमाह 1,000 रुपये की आर्थिक सहायता इसके अतिरिक्त, ‘निक्षय पोषण योजना’ के तहत मरीजों के बैंक खातों में प्रतिमाह 1,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे भेजी जा रही है, ताकि उनके खान-पान और पोषण में कोई कमी न आए। डॉ. विवेक कड़ोल ने बताया कि जिले में अत्याधुनिक सीबी-नॉट (CBNAAT) मशीनें और डिजिटल एक्सरे की सुविधा उपलब्ध है, जिससे टीबी की सटीक पहचान और उपचार में तेजी आई है।

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