कभी विदेशों के बाजारों में महक बिखेरने वाली कांगड़ा चाय अब खुद अपने वजूद की तलाश में है। गिरती मांग, बढ़ती लागत और जलवायु परिवर्तन की मार से जूझ रहे चाय बागानों में अब फिर से हरियाली लौटाने की तैयारी है। सरकार ने ‘टी-टूरिज्म’ यानी चाय पर्यटन के जरिए इस उद्योग में नई जान फूंकने का फैसला लिया है। जल्द ही धर्मशाला और पालमपुर को इस नई पहल का केंद्र बनाया जाएगा। यहां पर्यटक हरे-भरे चाय बागानों की सैर कर सकेंगे, फैक्ट्री विजिट में ‘पत्ते से पैकेट’ तक की प्रक्रिया देख पाएंगे और ताज़ा कांगड़ा चाय का स्वाद ले सकेंगे। साथ ही बागानों के बीच बने होमस्टे में पहाड़ी मेहमाननवाजी का आनंद भी मिलेगा। अब तक धर्मशाला और पालमपुर के कुछ बड़े बागानों में किए गए छोटे प्रयास काफी सफल रहे हैं। खास बात यह है कि यहां अब अन्य राज्यों से कपल प्री-वेडिंग फोटोशूट के लिए भी खींचे चले आ रहे हैं। हरे-भरे बागान, धौलाधार की पृष्ठभूमि और शांत वातावरण इन शूट्स को अनोखा बना देते हैं। बंगाल का मॉडल बनेगा रास्ता पर्यटन उपनिदेशक विनय धीमान के अनुसार, सरकार पश्चिम बंगाल के टी-टूरिज्म मॉडल का अध्ययन कर रही है। बंगाल में बागानों की 15 फीसदी भूमि को पर्यटन और अन्य संबंधित गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करने की इजाजत है, बशर्ते उत्पादन पर असर न पड़े और किसी मजदूर की नौकरी न जाए। उन्होंने कहा, “कांगड़ा में भी ऐसे ही मॉडल से न सिर्फ चाय उद्योग को राहत मिलेगी, बल्कि इको-टूरिज्म को भी नई उड़ान मिलेगी। जो जमीनें निष्क्रिय हैं, उन्हें अब आय के नए स्रोतों से जोड़ा जाएगा।” बढ़ रही लागत से दिक्कत, टूरिज्म से फायदा वाह टी एस्टेट के निदेशक सूर्य जय प्रकाश का कहना है, “अब केवल खेती से टिकना मुश्किल हो गया है। लागत बढ़ रही है लेकिन दाम नहीं। टी-टूरिज्म से न सिर्फ बिक्री बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार भी खुलेंगे और सरकार को टैक्स का फायदा मिलेगा।”

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