देवभूमि हिमाचल के शिमला और सिरमौर की बाउंड्री पर चूड़धार शिरगुल महाराज मंदिर में 52 साल बाद शांद महायज्ञ होने जा रहा है। इसके लिए जोरों से तैयारियां चल रही है। 55 से ज्यादा कमेटियां और 600 से ज्यादा सेवक (कारिंदे) शांद महायज्ञ की तैयारी में जुटे हैं। इस महायज्ञ का आयोजन चूड़धार शिरगुल महाराज मंदिर में 11 अक्टूबर को होगा। इसमें 20 हजार से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। शिरगुल मंदिर को 5 क्विंटल फूलों से सजाया जा रहा है। इन दिनों मंदिर के जीर्णोद्धार का काम चल रहा है। मंदिर की शिखर पर कुरूड़ लगाया जा रहा है। कुरूड़ यानी जो मंदिर का निर्माण कार्य खत्म होने की छत्त की शिखर पर लगाया जाता है। मंदिर तक कैसे पहुंचाया जाता है कुरूड़ कुरूड़ लकड़ी से बनाया जाता है। यह देवदार की लंबी शहतीर होती है, जिसे बीच में कुरेद कर बनाया जाता है, ताकि ढलान दार छत की चोटी के किनारों पर फिट आ सके। फिर बीच में इस लकड़ी पर सोने का या सोने से मढ़ा एक हांडा अथवा कलश जो निकले गुंबद की तरह होता उसे स्थापित किया जाता है जो विशेष ऊर्जा देता है। कुरूड़ की लकड़ी काटने से पहले पेड़ का पूजन किया जाता है। उसके बाद काट कर कुरूड़ बनाई जाती है। बनाने के बाद उसे फिर धरती पर नहीं रखा जाता।अगर कहीं रखना भी पड़ तो धरती से ऊपर उठे आसन पर रखा जाता है। इस कुरूड़ को लोग कंधे पर उठा कर बड़े जोश व उत्साह के साथ मन्दिर स्थल तक पहुंचाते है। इस दौरान विशेष जयकारें भी लगाते है। फिर मंत्रोच्चार के साथ इसे मन्दिर के शीर्ष पर स्थापित कर दिया जाता है। क्या है शांद महायज्ञ शांद महायज्ञ की परंपरा सदियों से आ रही है। इसमे देव समाज से जुड़े लोग, परगना, नंबरदार, कारदार, देवलू और श्रद्धालु शामिल होते है। इसमें सभी कारदारों को आवश्यक रूप से भाग लेना होता है। परंपरा के अनुसार, जो लोग देश-विदेश में रह रहे होते हैं, वह भी इसमें शामिल होते है। ऐसा ही महायज्ञ चूड़धार शिरगुल के आंगन में होने जा रहा है।