चुनावी महाकुंभ में इन विधवाओं के लिए किसी के पास कोई वादा नहीं है और ना ही भविष्य में कुछ बदलने का किसी ने सपना दिखाया है। परिवार के साथ समाज और सियासत ने भी इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया है और इन्होंने भी मान लिया है कि बृजभूमि की गलियों में गुमनाम मौत के अलावा इनके मुस्तकबिल में कुछ और है ही नहीं।
चुनावी महाकुंभ में इन विधवाओं के लिए किसी के पास कोई वादा नहीं है और ना ही भविष्य में कुछ बदलने का किसी ने सपना दिखाया है। परिवार के साथ समाज और सियासत ने भी इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया है और इन्होंने भी मान लिया है कि बृजभूमि की गलियों में गुमनाम मौत के अलावा इनके मुस्तकबिल में कुछ और है ही नहीं।