शिमला के उप नगर संजौली से भट्टाकुफर के बीच बन रही ट्विन ट्यूब टनल को लेकर हिमाचल हाईकोर्ट ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) से जवाब मांगा है। अदालत ने पूछा है कि जब शिमला बाईपास के लिए पहले ही जमीन अधिग्रहित कर करीब 600 करोड़ रुपए का मुआवजा बांटा जा चुका था, तो सतही सड़क बनाने की योजना छोड़कर घनी आबादी वाली पहाड़ी के नीचे टनल बनाने का फैसला क्यों लिया गया? अदालत ने यह भी पूछा कि मुआवजे पर खर्च हुए 600 करोड़ रुपए की भरपाई कौन करेगा? जस्टिस संदीप शर्मा की बैंच में गुरुवार को संजौली के निवासी विनीत शर्मा और अन्य की याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि सुरंग निर्माण के दौरान सुरक्षा उपायों का ध्यान नहीं रखा गया। इससे ऊपर की पहाड़ी पर बने मकानों में दरारें आई हैं और कुछ मकानों को असुरक्षित घोषित किया गया है। उन्होंने निर्माण कार्य तुरंत रोकने की मांग की। IIT रुड़की की रिपोर्ट तक काम शुरू नहीं करने की बात सुनवाई के दौरान NHAI की ओर से अदालत को बताया गया कि स्थानीय लोगों की शिकायतों और तकनीकी टीम की सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बाद 18 सितंबर 2026 से निर्माण कार्य बंद है। NHAI ने कहा कि IIT रुड़की की रिपोर्ट आने और स्थानीय लोगों के मकानों को नुकसान से बचाने के पर्याप्त इंतजाम होने तक काम दोबारा शुरू नहीं किया जाएगा। NHAI के इस बयान के बाद हाईकोर्ट ने अलग से निर्माण पर रोक लगाने का आदेश नहीं दिया। हालांकि, अदालत ने उम्मीद जताई कि अगली सुनवाई तक ट्विन ट्यूब टनल का निर्माण कार्य नहीं होगा। 600 करोड़ खर्च करने के बाद योजना क्यों बदली? याचिका में कहा गया कि शिमला बाईपास परियोजना की मूल योजना के तहत छकड़ेल, भट्टाकुफर और ढली से होकर सतही सड़क बनाई जानी थी। इसके लिए जमीन का अधिग्रहण किया गया और करीब 600 करोड़ रुपए मुआवजे के तौर पर बांटे गए। इस प्रक्रिया में लगभग 88 परिवारों के मकान तोड़े गए और परिवार विस्थापित हुए। कोर्ट ने पूछा; टनल बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? बाद में इस योजना को छोड़कर चलौठी, संजौली से भट्टाकुफर तक ट्विन ट्यूब टनल बनाने का प्रस्ताव अपनाया गया। हाईकोर्ट ने NHAI को जवाब में बताने को कहा है कि सतही सड़क की योजना छोड़ने और घनी आबादी वाली पहाड़ी के नीचे सुरंग बनाने की जरूरत क्यों पड़ी। अदालत ने यह भी पूछा है कि पहले दिए गए मुआवजे के रूप में सरकारी खजाने से खर्च हुए करीब 600 करोड़ रुपए की भरपाई कौन करेगा। पहाड़ी के ऊपर सैकड़ों मकान, कुछ जगह सिर्फ 14 मीटर दूरी अदालत के आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने तस्वीरें और दस्तावेज पेश किए, जिनमें टनल के ऊपर बड़ी संख्या में मकान होने की बात सामने रखी गई। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि निर्माण के दौरान कई मकानों में दरारें आई हैं और हाल में उनके घरों को भी असुरक्षित घोषित किया गया है। याचिका में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया। अदालत के आदेश के अनुसार, इस रिपोर्ट में ऐसी पहाड़ी के नीचे सुरंग बनाने को लेकर चिंता जताई गई थी, जिसके ऊपर सैकड़ों मकान बने हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कब्रिस्तान और विशाल मेगा मार्ट के आसपास कुछ जगहों पर सुरंग और ऊपर की सतह के बीच की दूरी महज 14 मीटर है। टनल के दोनों ओर से पानी निकलने का मुद्दा भी सामने आया। IIT रुड़की की टीम ने किया था दौरा अदालत के आदेश में दर्ज जानकारी के अनुसार, IIT रुड़की की तकनीकी टीम ने 1 अक्टूबर 2026 को मौके का दौरा किया था और सुरक्षा उपायों को लेकर चिंता जताई थी। NHAI की ओर से अदालत को बताया गया कि IIT रुड़की ने टनल निर्माण से जुड़े रिकॉर्ड भी मंगवाए हैं। इससे पहले स्थानीय लोगों की शिकायतों के बाद शिमला के उपायुक्त और NHAI के अधिकारियों ने मौके का दौरा किया था। इसके बाद ब्लास्टिंग का काम रोकने के निर्देश दिए गए थे। 17 नवंबर को अगली सुनवाई हाईकोर्ट ने मामले में संबंधित प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए हैं। केंद्र सरकार और राज्य सरकार की ओर से पेश वकीलों ने नोटिस स्वीकार किए और जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया। NHAI को विशेष रूप से सतही सड़क की योजना छोड़ने और 600 करोड़ रुपए के मुआवजे से जुड़े सवालों पर जवाब देना होगा। अब NHAI के जवाब और IIT रुड़की की तकनीकी रिपोर्ट से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि टनल निर्माण को लेकर उठाए गए सुरक्षा संबंधी सवालों पर क्या कदम उठाए जाएंगे।

Spread the love