हिमाचल प्रदेश के कसौली में आयोजित 15वें खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्टिवल (KSLF) का दूसरा दिन समसामयिक, पर्यावरणीय और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े ज्वलंत मुद्दों के नाम रहा।दूसरे विभिन्न सत्रों में देश के प्रतिष्ठित सैन्य अधिकारियों, लेखकों, पर्यावरणविदों, पूर्व नौकरशाहों और विचारकों ने लद्दाख के नाजुक पर्यावरण, कश्मीर में स्थायी शांति, सेना और आम नागरिकों के बदलते संबंधों, केंद्र सरकार की नीतियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के प्रभावों और प्रशासनिक सुधारों पर बेबाक विचार साझा किए। महोत्सव का प्रमुख आकर्षण ‘द हिमालयाज: क्लियर एंड प्रेजेंट डेंजर’ सत्र रहा, जिसमें हिमालयी क्षेत्र के भविष्य और इसकी चुनौतियों पर गंभीर मंथन हुआ 1-हिमालयी क्षेत्र और लद्दाख की चुनौतियां सोनम वांगचुक का संदेश: पर्यावरणविद् व नवोन्मेषक सोनम वांगचुक ने वर्चुअल माध्यम से जुड़कर जोर देकर कहा कि “लद्दाख को बचाना वास्तव में भारत को बचाना है।” अनियंत्रित विकास पर चिंता: पर्यावरणविद डॉ. रवि चोपड़ा और पूर्व नौकरशाह अवय शुक्ला ने हिमालय में बढ़ रहे अनियंत्रित खनन, अत्यधिक निर्माण कार्य और जलवायु परिवर्तन के खतरों पर गहरी चिंता व्यक्त की। वक्ताओं ने सर्वसम्मति से कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में विकास योजनाएं स्थानीय पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) के अनुकूल होनी चाहिए और निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों को शामिल किया जाना चाहिए।
केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल: ‘द आर्ट ऑफ डिसएग्रीमेंट’ सत्र में पत्रकार सुनेत्रा चौधरी से बातचीत करते हुए शिक्षाविद् तथा सोनम वांगचुक की पत्नी डॉ. गीतांजलि जे. आंग्मो ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार लद्दाख के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। उन्होंने सचेत किया कि राजनीतिक उपेक्षा से क्षेत्र में भू-माफिया और अवैध खनन की गतिविधियां बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि केवल किसी मंत्री के इस्तीफे से व्यवस्था नहीं बदलेगी, बल्कि समाज और शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार जरूरी हैं। डॉ. आंग्मो ने धर्म के राजनीतिक उपयोग की आलोचना करते हुए समावेशिता, करुणा और सहिष्णुता को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
2. राष्ट्रीय सुरक्षा और कश्मीर: “केवल बल प्रयोग से शांति संभव नहीं” राष्ट्रीय सुरक्षा और कश्मीर की वर्तमान परिस्थितियों पर भी कई विचारोत्तेजक सत्र आयोजित किए गए: अफस्पा (AFSPA) पर पूर्व सेना प्रमुख का रुख: पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (सेवानिवृत्त) ने किशलय भट्टाचार्जी के साथ संवाद में कहा कि केवल सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) को हटाना ही संघर्ष का अंतिम समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए समस्या की मूल वजहों को पहचानकर उनका स्थायी समाधान खोजना होगा।
सेना-नागरिक संबंधों में सुधार जनरल नरवणे ने बताया कि जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में सेना और आम नागरिकों के रिश्तों में सकारात्मक बदलाव आया है। पहले जो लोग सैन्य वाहनों को देखकर दूर भागते थे, अब वे सैनिकों के पास आकर उनका अभिवादन करते हैं, जो आपसी विश्वास का प्रतीक है। इस दौरान उन्होंने अपनी चर्चित पुस्तकों ‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड’ और ‘द कैंटोनमेंट कॉन्सपिरेसी’ पर चर्चा की तथा आगामी पुस्तक का जिक्र भी किया। कश्मीर मुद्दे पर स्थानीय संवाद आवश्यक: ‘ए GENERAL एंड ए स्पाई: द कश्मीर फाइल्स’ सत्र में पूर्व रॉ (RAW) प्रमुख ए.एस. दुलत ने फिल्म ‘धुरंधर’ को प्रोपेगेंडा करार दिया। पत्रकार सुनेत्रा चौधरी और मेजर जनरल रंजन महाजन के साथ चर्चा में दुलत ने कहा कि कश्मीर मामले में पाकिस्तान के स्थान पर स्थानीय कश्मीरियों के साथ बातचीत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। वक्ताओं ने माना कि स्थायी शांति बल प्रयोग के बजाय समानता, आपसी विश्वास और निरंतर संवाद से ही संभव है। 3. एआई, पर्यावरण संरक्षण और समाज एआई का दौर और मानवीय मूल्य: ‘डिस्टोपिया इन एन एआई वर्ल्ड’ सत्र में मंदीरा शाह ने विद्यार्थियों के साथ संवाद करते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण निजता, स्वतंत्र सोच और रचनात्मकता पर पड़ रहे प्रभावों को रेखांकित किया। टिकाऊ पर्यटन और विरासत: पर्यावरण पत्रकार बहार दत्त और लेखिका निखिता सिंह ने पर्वतीय क्षेत्रों में जिम्मेदार पर्यटन, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर रोक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर बल दिया। पीढ़ियों का अंतर और सुशासन: ‘इट्स टीन टाइम, ब्रो’ सत्र में पूजा पोद्दार मारवाह और शिनी एंटनी ने माता-पिता व किशोरों के बीच बढ़ते अंतर को कम करने के लिए सहानुभूति और संवाद को जरूरी बताया। वहीं ‘इंडिया अनप्लग्ड: गवर्नेंस फॉर GROWTH’ सत्र में राजीव बुधिराजा और लेफ्टिनेंट जनरल राज शुक्ला (सेवानिवृत्त) ने रक्षा क्षेत्र के आधुनिकीकरण, एआई/डीप टेक में निवेश और प्रशासनिक जवाबदेही पर विचार व्यक्त किए। साहित्य व संस्कृति के अन्य प्रमुख सत्र फेस्टिवल में अभिनेत्री दिव्या दत्ता के साथ ‘मी एंड मां’, सार्थक आहूजा व सैम टली के साथ ‘द फाउंडर्स ऑफिस’, तथा होइहनू हाउजेल व प्रीति गिल के साथ ‘मणिपुर: स्टोरीज द फायर कुड नॉट बर्न’ जैसे सत्रों में भी कला, साहित्य और समाज के विविध आयामों पर सार्थक बातचीत हुई।