शिमला जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस की हार हुई है। कांग्रेस के मजबूत गढ़ माने जाने वाले शिमला जिला परिषद पर भाजपा ने 26 साल बाद कब्जा जमाया है। इस जीत को सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए एक निकाय के नतीजे के तौर पर नहीं, बल्कि सरकार के लिए जमीनी राजनीतिक पकड़, संगठनात्मक ताकत और नेताओं के प्रभाव की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीति के जानकार इस रिजल्ट को कांग्रेस के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ‘वॉर्निंग बेल’ के तौर पर देख रहे हैं। वहीं, पिछले विधानसभा चुनाव में शिमला जिले की आठ में से एक सीट जीतने वाली भाजपा के लिए यह रिजल्ट मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाने वाला है। शिमला जिला परिषद में कांग्रेस की हार की 5 वजहें, जानिए… 2027 के विस चुनाव से पहले भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त जिला परिषद में 26 साल बाद कब्जा करना भाजपा के लिए सिर्फ एक पद हासिल करना नहीं है। यह पार्टी को शिमला जिले में संगठनात्मक मनोबल बढ़ाने और कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने का मौका देता है। पिछले विधानसभा चुनाव में मात्र एक सीट पर सिमटी भाजपा को इससे जिला में मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलेगी।

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