सर्वोच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश सरकार की विशेष अनुमति याचिकाओं (एसएलपी) को खारिज कर दिया है। यह फैसला प्रदेश के हजारों संविदा कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। हिमाचल प्रदेश राजकीय महाविद्यालय शिक्षक संघ (एचजीसीटीए) ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे कर्मचारियों की निर्णायक जीत बताया है। संघ की अध्यक्षा डॉ. बनीता सकलानी ने बताया कि पिछले एक दशक से अधिक समय से प्रदेश उच्च न्यायालय लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि संविदा सेवा की अवधि को कर्मचारियों के सेवा लाभों से अलग नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने ‘ताज मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य’ सहित कई मामलों में निर्देश दिए थे कि संविदा सेवा की गणना वेतन निर्धारण, वरिष्ठता, पदोन्नति, अर्जित अवकाश और पेंशन जैसे सभी सेवा लाभों के लिए की जाए। भर्ती एवं सेवा शर्तें अधिनियम 2024′ लागू किए एचजीसीटीए के अनुसार, न्यायालय के इन निर्देशों का पालन करने के बजाय राज्य सरकार ने ‘हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की भर्ती एवं सेवा शर्तें अधिनियम, 2024’ लागू किया। इस अधिनियम को बाद में उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित कर निरस्त कर दिया था। इसके बावजूद, सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर कीं, जिन्हें अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी खारिज कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों को नकारने का आधार नहीं बन सकता। आदेशों का निष्पक्ष और तत्काल क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए: संघ संघ ने कहा कि अब यह विवाद पूरी तरह समाप्त हो चुका है और सरकार के पास कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों को टालने का कोई कानूनीआधार नहीं बचा है। एचजीसीटीए ने राज्य सरकार से मांग की है कि सभी विभागों को तत्काल विस्तृत निर्देश जारी किए जाएं। इससे पात्र कर्मचारियों को वेतन निर्धारण, वरिष्ठता, पदोन्नति, अर्जित अवकाश, पेंशन तथा अन्य सभी सेवा लाभ बिना किसी देरी और भेदभाव के प्रदान किए जा सकें। संघ का कहना है कि सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पूर्ण, निष्पक्ष और तत्काल क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए।

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