हिमाचल प्रदेश के अपर शिमला सहित कई सेब उत्पादक क्षेत्रों में अल्टरनेरिया नामक फफूंद जनित रोग तेजी से फैल रहा है। इस बीमारी के कारण सेब के पेड़ों से समय से पहले पत्ते झड़ रहे हैं, जिससे फ्रूट क्वालिटी और प्रोडक्शन दोनों पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। लगातार तीन साल इस बीमारी के बढ़ते प्रकोप ने बागवानों की चिंता बढ़ा दी है। अल्टरनेरिया को समय रहते नहीं रोका गया तो 5500 करोड़ रुपए की एपल इंडस्ट्री पर इसकी मार पड़नी तय है। पहले ही कुदरत की मार की वजह से सेब उत्पादन ढाई करोड़ पेटी से कम में सिमटने का अनुमान है। ऐसे में अल्टरनेरिया की वजह से उत्पादन और कम हो सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र शिमला की प्रमुख डॉ. उषा शर्मा के अनुसार, यह बीमारी खासतौर पर निचले ऊंचाई वाले इलाकों में अधिक फैल रही है, जहां तापमान अधिक और नमी का स्तर ऊंचा है। ऐसे मौसम में फफूंद तेजी से विकसित होती है और पेड़ों को नुकसान पहुंचाती है। बागवानों का कहना है कि पिछले तीन-चार वर्षों से अल्टरनेरिया का हमला लगातार बढ़ रहा है। हर साल समय से पहले पत्ते झड़ने से पेड़ों की प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस यानी भोजन तैयार करने की) क्षमता घट जाती है, जिसका सीधा असर फलों के आकार, रंग और उत्पादन पर पड़ता है। इससे बागवानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। बीमारी पर नियंत्रण के लिए रिसर्च जरूरी: सोहन ठियोग के प्रोग्रेसिव ग्रोअर सोहन ठाकुर ने बताया कि पिछले कुछ सालों से अल्टरनेरिया लगातार बेकाबू होता जा रहा है, जो चिंता का विषय है। इस पर नियंत्रण के लिए नौणी यूनिवर्सिटी और बागवानी विभाग को रिसर्च करनी होगी। बागवानों पर लगाया गया था लापरवाही का आरोप पिछले कुछ वर्षों में इस बीमारी के लिए काफी हद तक बागवानों को जिम्मेदार ठहराया गया। विशेषज्ञों का कहना था कि कई बागवान नौणी विश्वविद्यालय द्वारा जारी फफूंदनाशी स्प्रे शेड्यूल का पालन नहीं कर रहे थे। इसके अलावा जरूरत से ज्यादा स्प्रे करना, विभिन्न रसायनों को बिना सलाह मिलाना और असंतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग भी पेड़ों को बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील बना रहा है। जागरूकता अभियान के बावजूद नहीं रुकी बीमारी बढ़ती समस्या को देखते हुए डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी ने इस वर्ष फरवरी में वैज्ञानिकों की कई टीमें विभिन्न सेब उत्पादक क्षेत्रों में भेजी थीं। इन टीमों ने बागवानों को रोग की रोकथाम और वैज्ञानिक तरीके से स्प्रे करने की जानकारी दी थी। इसके बावजूद इस सीजन में भी बीमारी तेजी से फैल रही है। फफूंदनाशकों पर उठने लगे सवाल अब कई बागवानों ने फफूंदनाशकों की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। ठियोग के प्रोग्रेसिव बागवान महेंद्र वर्मा ने बताया कि अधिकांश बागवान अब विश्वविद्यालय के स्प्रे शेड्यूल का पालन कर रहे हैं, फिर भी बीमारी पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। ‘डिलीशियस’ किस्म पर ज्यादा असर, अन्य किस्में सुरक्षित रतनाड़ी क्षेत्र के बागवान आशुतोष चौहान का कहना है कि यह बीमारी मुख्य रूप से डिलीशियस किस्म के सेबों में अधिक दिखाई दे रही है, जबकि गाला और ग्रैनी स्मिथ जैसी किस्मों में इसका असर अपेक्षाकृत कम है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि कहीं यह फफूंद का नया स्वरूप या नया वैरिएंट तो नहीं है। नए वैरिएंट की जांच की मांग कई बागवानों का मानना है कि यदि वैज्ञानिक सलाह और फफूंदनाशकों के बावजूद बीमारी पर नियंत्रण नहीं हो रहा है, तो इस पर नए सिरे से शोध की जरूरत है। उनका कहना है कि वैज्ञानिकों को यह जांच करनी चाहिए कि कहीं यह अल्टरनेरिया का नया स्ट्रेन या कोई नई बीमारी तो नहीं है। क्या है अल्टरनेरिया? अल्टरनेरिया एक फफूंद जनित रोग है, जो पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे बनाता है। संक्रमण बढ़ने पर पत्तियां समय से पहले झड़ जाती हैं। इससे पेड़ों की भोजन बनाने की क्षमता कम हो जाती है और फल का आकार, रंग, गुणवत्ता तथा उत्पादन प्रभावित होता है। गर्म और नम मौसम इस बीमारी के तेजी से फैलने के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर वैज्ञानिक सलाह के अनुसार फफूंदनाशी का छिड़काव, संतुलित पोषण और बागों की नियमित निगरानी ही इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है। हालांकि लगातार बढ़ते प्रकोप ने इस रोग पर व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत को भी सामने ला दिया है।