भारतीय रेलवे की ऐतिहासिक धरोहर और कांगड़ा घाटी रेलवे की असली पहचान रहा ZB-66 स्टीम इंजन एक बार फिर चर्चा में है। करीब चार वर्ष तक देश के इकलौते स्टीम लोको शेड (रेवाड़ी वर्कशॉप) में व्यापक मरम्मत के बाद यह ऐतिहासिक भाप इंजन आखिरकार वापस पठानकोट पहुंच चुका है। जेडबी-66 को रविवार की सुबह रेवाड़ी से एक विशेष मालगाड़ी (स्पेशल वैगन) के जरिए पठानकोट लाया गया है। जहां इसे देखने के लिए स्थानीय लोगों और रेल प्रेमियों की भीड़ उमड़ रही है। इस इंजन को प्यार से “कांगड़ा वैली एक्सप्रेस” भी कहा जाता है। यह इंजन अपनी विशिष्ट सीटी, काले धुएं के गुबार और पारंपरिक भाप तकनीक के कारण लोगों को भारतीय रेल के स्वर्णिम और राजसी इतिहास की याद दिलाता है। लंदन से शुरू हुआ था ZB-66 का सफर
इस नैरोगेज स्टीम इंजन का निर्माण वर्ष 1952 में लंदन की प्रसिद्ध कंपनी डब्ल्यू.जी. बैगन लिमिटेड (W.G. Bagnall Ltd.) द्वारा किया गया था। निर्माण के बाद इस इंजन को पठानकोट-जोगिंद्रनगर (हिमाचल प्रदेश) रेलखंड पर तैनात किया गया, जहां इसने वर्ष 1976 तक 48 वर्ष लगातार अपनी सेवाएं दीं। यह 2-6-2T लोकोमोटिव कांगड़ा वैली रेलवे का अंतिम बचा हुआ सक्रिय भाप इंजन है। दशकों तक बंद पड़े रहने के बाद, अमृतसर और बठिंडा की वर्कशॉप में विशेष मरम्मत करके इसे 2017 में फिर से चालू किया गया था।
2005 में विदेशी पर्यटकों के लिए कोशिश
वर्ष 2005-2006 में ब्रिटेन से आए पर्यटकों के एक समूह ने इस इंजन को चार दिन के लिए बुक किया था क्योंकि यह उनके पूर्वजों द्वारा निर्मित था। उस समय लखनऊ वर्कशॉप की टीम ने इसका नूरपुर तक सफल ट्रायल भी किया, लेकिन बॉयलर में आई तकनीकी खराबी के कारण यह नियमित नहीं हो सका। 2018 में 1.5 लाख में ब्रिटिश पर्यटकों को कराया था सफर इस जेडबी-66 स्टीम इंजन का व्यावसायिक इतिहास बेहद शानदार रहा है। करीब दो दशक के लंबे इंतजार के बाद, 2018 में रेलवे ने इसी इंजन को पूरी तरह चालू करके दो विशेष कोचों के साथ एक चार्टर्ड हेरिटेज सर्विस के रूप में पटरी पर उतारा था। ‘रेलवेज ऑफ द राज’ टूर: इंग्लैंड से भारत आए 14 वरिष्ठ ब्रिटिश पर्यटकों के एक विशेष समूह ने ‘ट्रेवल पाल्स’ कंपनी के जरिए इस शाही सफर का लुत्फ उठाने के लिए पूरी ट्रेन को बुक किया था। रेलवे ने इस ब्रिटिश ग्रुप से हिमाचल प्रदेश के पालमपुर से बैजनाथ पपरोला के बीच महज 14 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए करीब 1.5 लाख रुपये का किराया वसूला था। चार्टर्ड सर्विस होने के कारण यह ट्रेन पर्यटकों की इच्छानुसार खूबसूरत वादियों में जगह-जगह रुकी, जहां विदेशी सैलानियों ने इसकी तस्वीरें खींचीं और लगभग दो घंटे में यह सफर पूरा हुआ था। स्पेयर पार्ट्स और मैकेनिकों की कमी रही सबसे बड़ी चुनौती रेलवे अधिकारियों के अनुसार, देश में स्टीम इंजनों का परिचालन बंद होने के कारण सबसे बड़ी चुनौती इसके स्पेयर पार्ट्स (कलपुर्जों) और तकनीकी विशेषज्ञों का न मिलना रही। इसी वजह से साल 2022 में इसे व्यापक जीर्णोद्धार के लिए रेवाड़ी भेजा गया था। अब इसी हफ्ते रेवाड़ी से विशेषज्ञ इंजीनियरों की एक खास टीम पठानकोट पहुंचेगी, जो इसके पुर्जों को असेंबल कर इसे दोबारा ‘लाइव’ करेगी। अब स्टेशन परिसर में हेरिटेज के रूप में बढ़ेगी शोभा उत्तरी रेलवे के फिरोजपुर मंडल के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षा और तकनीकी कारणों से इस इंजन को दोबारा हिमाचल की ऊंची पहाड़ियों या जोगिंद्रनगर ट्रैक पर नियमित रूप से चलाने की कोई योजना नहीं है। मरम्मत के बाद इसे पठानकोट रेलवे स्टेशन परिसर में ‘विरासत इंजन’ के रूप में प्रदर्शित किया जाएगा।
पर्यटकों और रेल प्रेमियों को लुभाने के लिए इसे समय-समय पर लोको शेड से लेकर प्लेटफार्म तक ट्रैक पर चलाकर दिखाया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी इसकी कूकती सीटी और छुक-छुक की आवाज से भारतीय रेलवे के गौरवशाली इतिहास को लाइव महसूस कर सके। ZB-66 स्टीम इंजन से जुड़े रोचक तथ्य
ZB-66 भारतीय रेलवे की विरासत इंजनों में से एक है और इसे कांगड़ा वैली रेलवे की पहचान माना जाता है।
1. 1952 में ब्रिटेन में बना था
ZB-66 का निर्माण W.G. Bagnall Ltd., Stafford (युनाइटेड किंगडम) ने वर्ष 1952 में किया था।
2. कांगड़ा वैली रेलवे का इंजन
यह इंजन पठानकोट–जोगिंदरनगर (कांगड़ा वैली) की 2 फीट 6 इंच नैरो गेज लाइन पर चलने के लिए बनाया गया था।
3. अंतिम जीवित स्टीम इंजन
ZB-66 को कांगड़ा वैली रेलवे का अंतिम कार्यशील (ऑपरेशनल) स्टीम लोकोमोटिव माना जाता है।
4. व्हील व्यवस्था
इसकी व्हील व्यवस्था 2-6-2T है, जो पहाड़ी और घुमावदार नैरोगेज लाइनों के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
5. कई दशक बंद रहने के बाद पुनर्जीवित
लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद रेलवे की अमृतसर वर्कशॉप ने इसका बड़ा पुनरुद्धार किया। इंजन में बॉयलर, इंजेक्टर, अंडरफ्रेम और ड्राइवर कैब की व्यापक मरम्मत की गई।
6. 2017 में फिर से भाप छोड़ी
मार्च 2017 में ZB-66 को सफलतापूर्वक फिर से चालू किया गया और दशकों बाद इसमें दोबारा भाप बनाई गई।
7. 2018 में विशेष पर्यटक ट्रेन चलाई
नवंबर 2018 में लगभग दो दशक बाद ZB-66 ने कांगड़ा वैली लाइन पर एक विशेष चार्टर ट्रेन खींची, जिसमें ब्रिटेन से आए रेलवे-प्रेमी पर्यटक सवार थे।
8. पठानकोट से गहरा संबंध
इस इंजन का बेस लंबे समय तक पठानकोट रहा है और इसे अक्सर पठानकोट-जोगिंदरनगर नैरोगेज रेलवे की विरासत का प्रतीक माना जाता है।
9. रेलवे फोटोग्राफरों की पसंद
जब भी ZB-66 विशेष हेरिटेज रन पर निकलता है, पठानकोट, कांगड़ा, पालमपुर और बैजनाथ क्षेत्र में बड़ी संख्या में रेल-प्रेमी और फोटोग्राफर इसे देखने पहुंचते हैं।
10. “मिनी जाइंट” की पहचान
रेलवे इतिहासकार इसे अक्सर “Magnificent Mini Giant” कहते हैं, क्योंकि आकार में छोटा होने के बावजूद इसने दशकों तक पहाड़ी नैरोगेज लाइन पर शानदार सेवा दी।
पठानकोट के लिए खास क्यों?
पठानकोट भारत के उन चुनिंदा शहरों में है जहां आज भी ऐतिहासिक नैरो गेज रेलवे की विरासत मौजूद है। ZB-66 उसी विरासत का सबसे प्रसिद्ध जीवित प्रतीक है और कांगड़ा वैली रेलवे के इतिहास से उसका नाम हमेशा जुड़ा रहेगा।