हिमाचल सरकार इनकम जनरेशन के लिए कभी वाटर सेस, कभी लैंड रेवेन्यू, पेट्रोल-डीजल पर सेस जैसे कई फैसले ले चुकी है। मगर राज्य के सरकारी अस्पतालों में जो ‘मेडिसिन शॉप्स’ कमाऊ पूत साबित हो सकती हैं, उनका आवंटन पारदर्शी ढंग से नहीं किया जाता। करोड़ों रुपए का कारोबार करने वाली दवा दुकानें बिना ओपन टेंडर के चहेते लोगों को औने-पौने दाम पर दे दी जाती है। डॉक्टरों द्वारा सूचना का अधिकार कानून (RTI) के तहत जुटाई जानकारी के अनुसार- राज्य के अस्पतालों व मेडिकल कॉलेजों की 42 मेडिसिन शॉप से सरकार (सिविल सप्लाई कॉर्पोरेशन- रोगी कल्याण समिति) को साल 2023-24 में मात्र 37.29 लाख रुपए किराया मिला, जबकि शिमला के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल चमियाणा की इकलौती कैंटीन से सरकार को 32 लाख रुपए राजस्व मिला। कैंटीन की ऑक्शन ओपन बोली से हुई है, इसलिए सरकार व इसके उपक्रम को अच्छी कमाई हो रही है, जबकि सिविल सप्लाई कॉरपोरेशन की 42 दुकानों को जान-पहचान के आधार पर बिना टेंडर के दे दिया गया है। इसी तरह, PGI चंडीगढ़ में ओपन बोली से आवंटित 9 दुकानों से सालाना करीब 18.2 करोड़ की इनकम हो रही है, जबकि हिमाचल की दुकानें एक लाख सालाना रेवेन्यू भी नहीं दे रही।
हालांकि, 2022-23 में 42 दुकानों से ₹47.35 लाख रुपए की इनकम हुई थी, लेकिन इसके अगले साल (2023-24) में यह बढ़ने के बजाय लगभग 10 लाख रुपए कम हो गई। ऐसे में हिमाचल में भी यदि दुकानों की ऑक्शन में पारदर्शिता लाई जाए तो रोगी कल्याण समिति और सिविल सप्लाई कॉर्पोरेशन को अच्छी इनकम होगी। फाइनेंस सेक्रेटरी के ध्यान में भी मामला लाया हैरानी इस बात की है कि AIMSS चमियाणा अस्पताल फैकल्टी एसोसिएशन ने भी बीते दिनों फाइनेंस सेक्रेटरी को इसे लेकर एक प्रेजेंटेशन दी। एसोसिएशन के महासचिव डॉ. यशवंत ने फाइनेंस सेक्रेटरी को बताया कि इन दुकानों को ओपन टेंडर करके अच्छी कमाई हो सकती है। फाइनेंस सेक्रेटरी ने भी उनका यह प्रस्ताव मान लिया, मगर मुख्यमंत्री कार्यालय तक मामला जाने के बाद फाइल आगे नहीं बढ़ पाई, क्योंकि इन दुकानों का आवंटन चहेते लोगों के लिए किया जाता है। कांग्रेस-बीजेपी दोनों सरकारों में पारदर्शिता नहीं रही सरकार चाहे बीजेपी की हो या फिर कांग्रेस की, दोनों सरकारों में चहेते लोगों को दुकानों का आवंटन बिना टेंडर के होता रहा है। यही वजह है कि इन दुकानों से सरकार को अच्छा रेवेन्यू नहीं मिल पा रहा। इनसे कुल टर्नओवर का मात्र 0.2 फीसदी (कुछेक जगह 1 फीसदी) किराया लिया जाता है। वहीं मरीजों के लिए बुरा पहलू यह है कि राज्य की इन दवा दुकानों में मरीजों को दवाइयों पर लगभग 10 फीसदी डिस्काउंट दिया जाता है, जबकि PGI में यह कम से कम 15 फीसदी और अधिकतम 30 से 40 फीसदी है। कम किराए को टर्नओवर भी कम शो करते हैं सूत्र बताते हैं कि मात्र 0.2 फीसदी किराया होने के बावजूद भी दुकान संचालकों द्वारा टर्नओवर कम करके दिखाया जाता है, जिससे सरकार को और भी कम राजस्व मिल पाता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब एक कैंटीन सरकार को 32 लाख रुपये किराया देती है और PGI में मात्र 9 दुकानें 18 करोड़ से ज्यादा इनकम देती हैं, तो हिमाचल में अरबों रुपये का कारोबार करने वाली 42 दुकानों से लगभग मात्र 38 लाख रुपये क्यों। इसके बाद सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में संचालित दवा दुकानों को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। सीएम के समक्ष उठाएंगे: धर्माणी राज्य के तकनीकी शिक्षा मंत्री एवं रिसोर्स मोबिलाइजेशन कैबिनेट सब कमेटी मेंबर राजेश धर्माणी ने बताया कि यह मामला उनके ध्यान में नहीं था। इस मसले को CM के समक्ष उठाया जाएगा। ओपन टेंडर से मेडिसिन शॉप की नीलामी से आय बढ़ेगी।