हिमाचल हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव से पहले राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। महिला मंडल उमरी समेत कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ कहा कि पंचायतों के गठन, पुनर्गठन और सीमांकन (डिलिमिटेशन) की प्रक्रिया कानून के अनुसार ही होनी चाहिए और नियमों का पालन अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि यदि डिलिमिटेशन तय नियमों के तहत नहीं किया गया है तो उसे अवैध माना जाएगा और चुनाव में उसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद राज्य सरकार द्वारा 13 फरवरी के बाद बनाई गई नई पंचायतों पर तलवार लटक गई है, क्योंकि ज्यादातर पंचायतों के गठन में नियमों का पालन नहीं किया गया। डिलिमिटेशन के लिए नियमों में यदि ऑब्जेक्शन-सुजेशन को 7 सप्ताह के टाइम का प्रावधान है, तो सरकार ने तीन से चार दिन दिए है। ऐसी सभी पंचायतों में चुनाव नहीं होंगे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंचायतों से जुड़ी प्रक्रिया दो चरणों में होती है। पहले- सरकार पंचायतों का गठन या पुनर्गठन करती है और उसके बाद संबंधित डीसी द्वारा क्षेत्रों का डिलिमिटेशन किया जाता है। इस दौरान तय नियमों के तहत नोटिस देना, आपत्तियां लेना और उन पर फैसला करना जरूरी होता है। अगर इन नियमों का पालन नहीं किया गया तो पूरी प्रक्रिया गलत मानी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर के बाद की प्रक्रिया पर कोर्ट सख्त अदालत ने 13 फरवरी 2026 के बाद की गई प्रक्रियाओं पर खास सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने कहा कि इस तारीख के बाद जिन पंचायतों में नया सीमांकन किया गया और उसमें नियमों का पालन नहीं हुआ, वहां चुनाव पुराने ढांचे के आधार पर ही कराए जाएंगे। यानी हाल में किए गए बदलाव फिलहाल लागू नहीं होंगे। जहां नियमों का पालन, वह नई पंचायत मान्य होगी साथ ही, जिन मामलों में नियमों का पूरी तरह पालन किया गया है, वही मान्य होंगे और उन्हीं के आधार पर चुनाव कराए जा सकेंगे। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह इन नियमों के अनुसार पंचायत चुनाव का आरक्षण रोस्टर 7 अप्रैल 2026 तक जारी करे और पूरी चुनाव प्रक्रिया तय समय सीमा में पूरी करे। इस फैसले का सीधा असर प्रदेश के पंचायत चुनावों पर पड़ेगा। कई जगहों पर प्रशासन को पुराने ढांचे के आधार पर ही चुनाव कराने होंगे। हाईकोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि पंचायत चुनाव में किसी भी तरह की जल्दबाजी या नियमों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी।