ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध का असर अब हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों तक पहुंच गया है। कांगड़ा घाटी में धौलाधार की गोद में बसा धर्मकोट गांव इन दिनों वीरान पड़ा है। इस गांव को जिसे ‘मिनी तेल अवीव’ के नाम से जाना जाता है। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण इजरायली पर्यटकों ने यहां से दूरी बना ली है, जिससे कभी हिब्रू भाषा से गुलजार रहने वाला यह स्थान अब शांत है। हिब्रू भाषा में लिखे हैं कैफे, गेस्ट हाउस और रेस्तरां के साइन बोर्ड मैक्लोडगंज के ऊपरी हिस्से में स्थित धर्मकोट पिछले कई दशकों से इजरायली संस्कृति का केंद्र रहा है। यहां की गलियों में इजरायल के छोटे कस्बे जैसा अनुभव होता है। स्थानीय कैफे, गेस्ट हाउस और रेस्तरां के साइन बोर्ड और मेन्यू कार्ड तक हिब्रू भाषा में लिखे होते हैं। इजरायली युवा अपनी सैन्य सेवा पूरी करने के बाद अक्सर यहां सुकून की तलाश में महीनों रुकते थे। इजरायली सैलानी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ व्यापार मंडल मैक्लोडगंज के अध्यक्ष नरेंद्र पठानिया ने बताया कि इजरायली सैलानी इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। युद्ध के कारण उड़ानों के रद्द होने और सुरक्षा चिंताओं के चलते पर्यटकों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है। इससे स्थानीय कारोबारियों की चिंताएं बढ़ गई हैं, क्योंकि उनकी आजीविका सीधे तौर पर इन पर्यटकों पर निर्भर करती है। रेस्तरां में छाई वीरानी, कुर्सियां खाली ट्रेवल एजेंट और ट्रेकर प्रेम सागर के अनुसार, आमतौर पर इस मौसम में धर्मकोट और भागसूनाग जैसे इलाकों में रोजाना सैकड़ों इजरायली पर्यटक आते थे। हालांकि, वर्तमान में यह संख्या नाममात्र रह गई है। धर्मकोट की पहचान बन चुके हुमस, शाक्षुका और फलाफल जैसे इजरायली व्यंजनों की महक भी अब फीकी पड़ गई है। रेस्तरां संचालकों ने बताया कि उन्होंने इजरायली पर्यटकों की पसंद के अनुसार अपने खानपान में बदलाव किए थे, लेकिन अब उनकी कुर्सियां खाली पड़ी हैं। वैश्विक समीकरणों का गहरा असर इस छोटे से गांव पर वैश्विक समीकरणों का गहरा असर पड़ा है। यहां का पूरा बाजार अब इजरायल-ईरान तनाव कम होने और शांति बहाल होने की उम्मीद कर रहा है, ताकि एक बार फिर से धर्मकोट की रौनक लौट सके।

Spread the love