हिमाचल प्रदेश के इतिहास में पहली बार सभी 3577 पंचायतों में प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर) नियुक्त किए जाएंगे। मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों का 5 वर्ष का कार्यकाल 31 जनवरी 2026 को पूरा हो रहा है। कार्यकाल समाप्त होते ही प्रदेश की सभी पंचायतें स्वतः भंग हो जाएंगी। इसके बाद, पंचायतों में प्रशासनिक व्यवस्था 30 हजार प्रतिनिधि नहीं, बल्कि एडमिनिस्ट्रेटर चलाएंगे। पंचायत के विकास कार्य से जुड़े फैसले एडमिनिस्ट्रेटर लेंगे। पंचायतीराज विभाग के डायरेक्टर राघव शर्मा ने बताया कि, सरकार को 2 प्रस्ताव भेजे हैं। पहला पंचायत सेक्रेटरी को ही एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त करने का प्रस्ताव है। दूसरे प्रस्ताव में 3 मेंबर की कमेटी बनाने का सुझाव है। इसमें संबंधित क्षेत्र के स्कूल प्रिंसिपल या हेडमास्टर में से किसी एक को प्रशासक बनाया जाए। कमेटी में ग्राम रोजगार सेवक (GRS) और पंचायत सचिव को सदस्य बनाया जाए। अब इस पर सरकार को फैसला लेना है। पंचायतीराज मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने बताया कि, उनके पास विभाग के प्रस्ताव की फाइल पहुंच गई है। सीएम से चर्चा के बाद इस पर अगले तीन-चार दिनों के दौरान फैसला किया जाएगा। पंचायत भंग होते ही क्या बदलेगा? पंचायतों का जैसे ही 5 साल का कार्यकाल पूरा होगा, प्रधान, उपप्रधान, वार्ड सदस्य, पंचायत समिति सदस्य (BDC) और जिला परिषद के सदस्य पदमुक्त हो जाएंगे। इसके बाद पंचायत में होने वाले सभी विकास कार्य, योजनाओं की स्वीकृति, भुगतान और प्रशासनिक फैसले एडमिनिस्ट्रेटर के हाथ में होंगे। गांवों के विकास से जुड़े फैसलों में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की भागीदारी अस्थायी रूप से खत्म हो जाएगी। वित्त आयोग की ग्रांट पर संकट प्रशासक व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान पंचायतों को वित्त आयोग की ग्रांट के रूप में झेलना पड़ेगा। 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों में स्पष्ट है कि इलेक्टेड पंचायत नहीं होने पर वित्त आयोग की ग्रांट नहीं मिलेगी। वित्त आयोग में साल में दो बार ग्रांट मिलती है। हालांकि, मौजूदा वित्त वर्ष के लिए लगभग 171 करोड़ रुपए की ग्रांट हिमाचल को पहले ही मिल चुकी है। 31 मार्च के बाद जब तक चुनाव नहीं होते, तब तक इस ग्रांट पर कट लग सकता है। 31 मार्च के बाद 16वां वित्त आयोग लागू होगा। इसकी सिफारिशों पर भी ग्रांट निर्भर करेगी। सरकार को 5 करोड़ रुपए की मासिक बचत इस पूरी व्यवस्था का दूसरा आर्थिक पहलू भी है। हिमाचल की 3577 पंचायतों में करीब 30 हजार जनप्रतिनिधि हैं। इनमें लगभग 21 हजार वार्ड मेंबर हैं, जबकि शेष प्रधान, उपप्रधान, पंचायत समिति और जिला परिषद सदस्य हैं। वार्ड मेंबर को छोड़कर अन्य प्रतिनिधियों के मानदेय पर सरकार हर महीने लगभग 5 करोड़ रुपए खर्च करती है, जबकि वार्ड मेंबर को केवल ग्रामसभा की मीटिंग में शामिल होने पर ही पैसा मिलता है। पंचायतों के भंग होने के बाद हर महीने 5 करोड़ की बचत होगी। हालांकि, इसके बदले पंचायतों को वित्त आयोग की ग्रांट नहीं मिल पाएगी, जो विकास के लिए कहीं ज्यादा अहम मानी जाती है। पहले, 45 पंचायतों में लग चुके एडमिनिस्ट्रेटर हिमाचल की सभी पंचायतों में पहली बार एडमिनिस्ट्रेटर लगने जा रहे है। मगर, दुर्गम क्षेत्र लाहौल स्पीति और पांगी की लगभग 45 पंचायतों में 2021 में भी कोरोना काल में एडमिनिस्ट्रेटर लग चुके हैं। मगर तब यह व्यवस्था राज्य के दुर्गम क्षेत्रों की चुनिंदा पंचायतों तक सीमित थी। क्यों नियुक्त किए जा रहे हैं एडमिनिस्ट्रेटर? दरअसल, स्टेट इलेक्शन कमीशन दिसंबर में पंचायतों के साथ नगर निकाय चुनाव कराने की तैयारी में था। मगर सरकार आपदा का हवाला देते हुए पंचायत चुनाव को तैयार नहीं हुई। इससे मामला हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) पर फैसला सुनाते हुए 30 अप्रैल से पहले पंचायत चुनाव कराने के आदेश दे रखे हैं। तय समय पर चुनाव नहीं होने से हिमाचल में एडमिनिस्ट्रेटर लगाने की नौबत आई है, जिसे लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं माना जाता। पंचायतों से पहले राज्य के 47 नगर निकायों में सरकार तीन दिन पहले ही एडमिनिस्ट्रेटर लगा चुकी है। वहीं, बीते दिनों कुछ पंचायत प्रधान मंत्री से मिलकर उनके कार्यकाल को आगे बढ़ाने का अनुरोध कर चुके हैं।