हिमाचल में शिमला जिले की रामपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना तय है। कांग्रेस विधायक नंद लाल के निधन से यह सीट खाली हो गई है। 14वीं विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने में अभी 14 महीने का समय शेष है। ऐसे में रामपुर में निर्वाचन विभाग को 6 महीने के भीतर उप चुनाव कराना होगा। मुख्य निर्वाचन अधिकारी जल्द इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया से उप चुनाव की सिफारिश करेंगे। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A के तहत विधानसभा की खाली सीट पर उपचुनाव छह महीने के भीतर कराना अनिवार्य होता है। यानी दिसंबर 2027 के मुकाबले से पहले सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी भाजपा एक बार फिर आमने सामने होगी। हालांकि रामपुर में आज तक बीजेपी कभी चुनाव नहीं जीती। यह सीट परंपरागत तौर पर कांग्रेस की रही है। 1977 में कांग्रेस एक बार जरूर जनता दल प्रत्याशी निनजू राम से जरूर हारी थी। बाकी हर बार कांग्रेस का दबदबा रहा। मगर 2022 के चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी कौल नेगी मात्र 567 वोटों के अंतर से हारे थे। इससे उप चुनाव में भी कांटे की टक्कर हो सकती है। हालांकि यह सब दोनों दलों के प्रत्याशियों पर निर्भर करेगा। 14वीं विधानसभा में 10वां उप चुनाव होगा 14वीं विधानसभा के कार्यकाल में यह 10वां उप चुनाव होगा। इससे पहले नौ सीटों पर उप चुनाव हो चुके है, क्योंकि कांग्रेस के छह पूर्व विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ बगावत की थी और क्रॉस वोट किया था। बाद में स्पीकर कुलदीप सिंह पठानिया ने इन्हें डिस्क्वालिफाई कर दिया था। 3 निर्दलीय ने दिए थे इस्तीफे इसी तरह तीन निर्दलीय ने क्रॉस वोट के बाद इस्तीफे दिए थे। इसके बाद धर्मशाला, सुजानपुर, लाहौल स्पीति, बड़सर, गगरेट, कुटलैहड़, नालागढ़, हमीरपुर और देहरा में उप चुनाव हो चुके है। इस बार उपचुनाव की वजह राजनीतिक दलों के बीच सत्ता संघर्ष या विधायकों की बगावत नहीं, बल्कि मौजूदा विधायक का निधन है। दिसंबर 2027 से पहले जनता का रुख बताएंगे रामपुर उप चुनाव के नतीजे रामपुर के रिजल्ट का सरकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास नंदलाल के निधन के बावजूद 39 विधायक और बीजेपी के पास 28 MLA है। मगर दिसंबर 2027 के चुनाव से पहले यह उप चुनाव जनता का रुख बताएगा। कांग्रेस को नए प्रत्याशी पर खेलना होगा दांव नंदलाल के निधन के बाद पार्टी को रामपुर में नया प्रत्याशी उतारना होगा। पार्टी के लिए चुनौती केवल उपचुनाव जीतने की नहीं होगी, बल्कि रामपुर में अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार को बरकरार रखने की भी होगी।