अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव की सांस्कृतिक संध्या सोमवार रात पंजाबी सूफी गायक सतिंदर सरताज के नाम रही। लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र में उनकी एक झलक पाने और आवाज सुनने के लिए भारी भीड़ उमड़ी। बैठने की तो दूर, खड़े होने की भी जगह नहीं बची। कई दर्शक निराश होकर लौटे। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू मुख्य अतिथि थे। सरताज ने कार्यक्रम की शुरुआत हिमाचली लोकगीत ‘माए नी मेरिए, शिमले दी राहें’ से की। इसके बाद उन्होंने अपनी सूफियाना और पंजाबी गीतों से माहौल बना दिया। दर्शक देर रात तक संगीत का आनंद लेते रहे। कुल्लू-मनाली की खूबसूरती से प्रभावित सरताज ने कहा कि पंजाब के बाद ऐसा नजारा पहली बार देखा। उन्होंने हिमाचल और पंजाब की संस्कृति व डांस को करीब बताया। उनकी प्रस्तुति में हिंदी, सूफी और पंजाबी गीतों का संगम दिखा। कला केंद्र के बाहर भी रही दर्शकों की भीड़
सतिंदर सरताज को सुनने के लिए कुल्लू, मनाली और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। कला केंद्र के भीतर दर्शकों की भारी भीड़ रही, जबकि प्रवेश नहीं मिल पाने के कारण कई लोगों को बाहर से ही लौटना पड़ा। सरताज की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके कार्यक्रम को लेकर दर्शकों में देर रात तक जबरदस्त उत्साह बना रहा। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा की छठी सांस्कृतिक संध्या ने उत्सव के अंतिम चरण में संगीत प्रेमियों को यादगार शाम दी।

आज लंका दहन के साथ संपन्न होगा अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का आज अंतिम दिन है। सात दिवसीय महापर्व का समापन ब्यास नदी के किनारे लंका बेकर के पास पारंपरिक लंका दहन की रस्म के साथ होगा। कुल्लू दशहरे की यह परंपरा देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से अलग है। यहां रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के बड़े-बड़े पुतले नहीं जलाए जाते, बल्कि सूखी लकड़ियों और घास के ढेर को प्रतीकात्मक रूप से जलाकर लंका दहन की रस्म निभाई जाती है।

इस परंपरा में भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा का विशेष महत्व है। भगवान रघुनाथ जी अपने भव्य रथ में सवार होकर लंका दहन स्थल तक पहुंचेंगे। घाटी के विभिन्न क्षेत्रों से दशहरा उत्सव में शामिल होने आए देवी-देवता और उनके देवलू भी इस पारंपरिक आयोजन का हिस्सा बनेंगे। लंका दहन के साथ ही उत्सव के समापन की रस्में पूरी होंगी।

विदा होंगे रघुनाथ जी और देवी-देवता, अपने मूल स्थानों की ओर लौटेंगे
दशहरा उत्सव के अंतिम दिन लंका दहन के बाद भगवान रघुनाथ जी और घाटी के देवी-देवताओं की विदाई का सिलसिला शुरू होगा। सात दिनों तक ढालपुर में देव परंपराओं का निर्वहन करने और भगवान रघुनाथ जी के दरबार में हाजिरी भरने के बाद देवी-देवता अपने-अपने मूल स्थानों की ओर लौटेंगे। कुछ देवी-देवता मंगलवार सुबह रवाना होंगे। इसके साथ ही ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में सजी देव संस्कृति और आस्था की अनूठी छटा अपने समापन की ओर बढ़ेगी।

नजरें मुख्यमंत्री की घोषणाओं पर, देव समाज को उम्मीद
दशहरा उत्सव के समापन अवसर पर मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू की घोषणाओं पर भी सभी की नजरें रहेंगी। खासकर देवी-देवताओं के नजराने, बजंतरियों के मानदेय और देव समाज से जुड़े अन्य विषयों को लेकर संबंधित वर्गों को सरकार से उम्मीदें हैं। गुर संघ, पुजारी संघ और बजंतरी भी यह देखना चाहते हैं कि मुख्यमंत्री उनके लिए क्या घोषणा करते हैं। दशहरा उत्सव में देव समाज की अहम भूमिका को देखते हुए इन विषयों पर होने वाला ऐलान महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आज सजेगी कुल्लवी नाइट की महफिल
दशहरा उत्सव के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आज कुल्लवी नाइट का आयोजन होगा। इसमें कुल्लवी लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत और पहाड़ी गीतों की प्रस्तुतियों के जरिए हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत का रंग देखने को मिलेगा। सतिंदर सरताज की सूफियाना शाम के बाद अब दर्शकों की निगाहें कुल्लवी नाइट पर रहेंगी, जहां स्थानीय लोक संगीत और कलाकारों की प्रस्तुतियां उत्सव के अंतिम दिन को खास बनाएंगी। कुल्लू दशहरा उत्सव के PHOTOS

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