हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकारी भर्तियों में आरक्षण को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि आरक्षित श्रेणी का कोई उम्मीदवार अगर अपने अंकों के दम पर सामान्य श्रेणी के कटऑफ से ज्यादा नंबर हासिल करता है, तो उसे सामान्य श्रेणी की सीट पर जगह दी जानी चाहिए। ऐसे उम्मीदवार को आरक्षित सीट पर समायोजित नहीं किया जा सकता। जस्टिस ज्योत्सना रिवाल दुआ ने कृष्णा कुमारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। मामला ट्रेंड ग्रेजुएट टीचर (TGT) आर्ट्स के 425 पदों पर भर्ती से जुड़ा है। हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग ने 27 मई 2025 को इन पदों के लिए आवेदन मांगे थे। इनमें सामान्य श्रेणी के 151 और एससी श्रेणी के 17 पद शामिल थे। कृष्णा कुमारी ने एससी (बीपीएल) श्रेणी में परीक्षा दी थी। अंतिम परिणाम में उन्हें 64 अंक मिले और वह इस श्रेणी की वेटिंग लिस्ट में पहले स्थान पर थीं। मेरिट सूची में एससी (बीपीएल) श्रेणी के तीन उम्मीदवारों ने 75.24, 73.06 और 71.86 अंक हासिल किए थे। ये सभी सामान्य श्रेणी के कटऑफ 67.61 अंक से ज्यादा थे। इसके बावजूद चयन आयोग ने इन उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी की सीटों पर रखने के बजाय एससी (बीपीएल) की आरक्षित सीटों पर ही समायोजित कर दिया। इससे कृष्णा कुमारी को वेटिंग लिस्ट में पहले स्थान पर होने के बावजूद नियुक्ति नहीं मिल पाई। कोर्ट ने 12 नवंबर 2014 कके नियम को खारिज किया चयन आयोग ने अदालत में दलील दी कि कार्मिक विभाग के 12 नवंबर 2014 के निर्देशों के अनुसार, क्षैतिज आरक्षण की श्रेणियों में मेरिट के आधार पर सामान्य श्रेणी में समायोजन का नियम लागू नहीं होता। हाईकोर्ट ने आयोग की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरक्षण क्षैतिज हो या ऊर्ध्वाधर, यदि किसी आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार के अंक सामान्य श्रेणी के अंतिम चयनित उम्मीदवार से ज्यादा हैं, तो उसे सामान्य श्रेणी की सीट पर समायोजित किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता को नियुक्ति देने के आदेश अदालत ने चयन आयोग को मेरिट सूची में क्रम संख्या 51 और 97 पर शामिल दो एससी (बीपीएल) उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी में समायोजित करने का आदेश दिया। इससे एससी (बीपीएल) श्रेणी में खाली होने वाली सीट पर वेटिंग लिस्ट में पहले स्थान पर रहीं कृष्णा कुमारी को नियुक्ति देने का रास्ता साफ हुआ।