विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर मंडी में देवभूमि पर्यावरण रक्षक मंच ने गौरैया संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक किया। मंच के अध्यक्ष नरेंद्र सैणी ने बताया कि गौरैया की संख्या तेजी से घट रही है और यह विलुप्ति की कगार पर है। हालांकि, मंडी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग इन्हें दाना-पानी देते हैं। यहां अयोजित एक कार्यक्रम में नरेंद्र सैणी ने बताया कि पहले घरों के निर्माण में दीवारों और छतों में छोटे स्थान छोड़े जाते थे, जहां गौरैया आसानी से घोंसले बना लेती थी। गौरैया इंसानों के आसपास रहना पसंद करती है, लेकिन कंक्रीट के घरों और शहरीकरण ने इनके प्राकृतिक आवासों को समाप्त कर दिया है। उन्होंने कहा कि गौरैया प्रकृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह कीड़ों को खाकर फसलों को नुकसान से बचाती है और कई बार प्राकृतिक आपदाओं के संकेत भी देती है। सैणी ने अपील की कि आज के समय में गौरैया लगातार कम होती जा रही है। हम सभी का कर्तव्य है कि हम इसके लिए अपने घरों में दाना-पानी रखें और रहने के लिए सुरक्षित स्थान बनाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसे देख सकें। यह दुनिया की सबसे अधिक पहचानी जाने वाली पक्षी प्रजातियों में से एक है। भारत में मुख्य रूप से गौरैया की पांच प्रमुख प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें हाउस स्पैरो, येलो-थ्रोटेड स्पैरो, सिंधी स्पैरो, रसेट स्पैरो और डेड सी स्पैरो शामिल हैं। पिछले कुछ दशकों में मोबाइल टावरों से निकलने वाले रेडिएशन, प्रदूषण और बदलती जीवनशैली के कारण इनकी संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। ऐसे में इस छोटी चिड़िया को बचाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है, ताकि भविष्य की पीढ़ियां भी गौरैया की चहचहाहट सुन सकें।