कांगड़ा जिले में तिब्बत के 1959 के राष्ट्रीय विद्रोह की 67वीं वर्षगांठ मनाई गई। इस अवसर पर धर्मशाला और मैक्लोडगंज में निर्वासित तिब्बतियों और तिब्बत समर्थक संगठनों ने चीन की नीतियों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। जिसमें हजारों तिब्बतियों ने सड़कों पर मार्च निकाला, तिब्बत की आजादी और मानवाधिकारों की बहाली की मांग की। बता दे कि इस मार्च में विदेशी पर्यटकों ने भी हिस्सा लिया। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) ने मैक्लोडगंज स्थित चुगलाखंग बौद्ध मठ में एक आधिकारिक कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें विभिन्न देशों के सांसदों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने भाग लेकर तिब्बती समुदाय के प्रति एकजुटता व्यक्त की। दलाई लामा नहीं रहे मौजूद तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा इस वर्ष समारोह में उपस्थित नहीं थे। कार्यक्रम में उनके लंबे जीवन और तिब्बत में शांति की कामना की गई। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के प्रमुख (सिक्योंग) पेंपा त्सेरिंग ने समारोह को संबोधित किया। उन्होंने 1959 के विद्रोह में शहीद हुए तिब्बतियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
सिक्योंग ने कहा कि तिब्बती लोगों ने अपने धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है। उन्होंने तिब्बत में रह रहे लोगों की कठिन परिस्थितियों का जिक्र करते हुए उनके दुखों के शीघ्र अंत की प्रार्थना की। लोगों ने निकाला विरोध मार्च समारोह के बाद, पांच गैर-राजनीतिक तिब्बती संगठनों के आह्वान पर हजारों लोगों ने विरोध मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों ने चीन सरकार के खिलाफ नारे लगाए और तिब्बत में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग की। कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी पारंपरिक तिब्बती पोशाक पहने कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी दीं और बौद्ध मठ में तिब्बती गीतों का आयोजन किया गया। सिक्योंग पेंपा त्सेरिंग ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर की गई कार्रवाई को चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि चीन को तिब्बतियों के अधिकारों और उनकी आकांक्षाओं का सम्मान करना चाहिए। दुनिया भर में मनाया जाता है यह दिवस उल्लेखनीय है कि 10 मार्च 1959 को ल्हासा में हजारों तिब्बतियों ने चीनी शासन के खिलाफ विद्रोह किया था। इसी की याद में हर वर्ष धर्मशाला सहित दुनिया भर में तिब्बती समुदाय यह दिवस मनाता है।

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