हिमाचल प्रदेश के धारकंडी स्थित बोह घाटी में राज्य का पहला ट्राउट हब बनकर तैयार हो गया है। यह परियोजना क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर भी सृजित करेगी। शाहपुर से 25 किलोमीटर दूर यह घाटी अब ‘खबरू वॉटरफॉल’ और देवदार के जंगलों के अलावा ट्राउट पालन के लिए भी जानी जाएगी। इस महत्वाकांक्षी परियोजना की घोषणा शाहपुर के विधायक और उपमुख्य सचेतक केवल सिंह पठानिया की पहल पर मुख्यमंत्री ने बजट में की थी। यह परियोजना अब 3.03 करोड़ रुपए की लागत से धरातल पर उतर चुकी है, जिसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। विधायक केवल सिंह पठानिया ने युवाओं से नौकरी के पीछे भागने के बजाय स्वरोजगार अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि ट्राउट पालन एक पर्यावरण-अनुकूल और लाभदायक व्यवसाय है, जो क्षेत्र के लिए आर्थिक समृद्धि ला सकता है। मत्स्य विभाग के अनुसार, इस हब को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया गया है। कुल 3.03 करोड़ रुपए के बजट में से 2.11 करोड़ रुपए की योजनाएं स्वीकृत की गई हैं। यहां 34 प्रस्तावित रेसवेज में से 20 बनकर तैयार हो चुके हैं। अब तक 88.50 लाख रुपए की सरकारी सब्सिडी भी जारी की जा चुकी है। डिलीवरी के लिए उपलब्ध कराई बाइस बॉक्स वाली बाइक मार्केटिंग सहायता के लिए शाहपुर और धर्मशाला में फिश कियोस्क स्थापित किए गए हैं। साथ ही, डिलीवरी के लिए आइस बॉक्स वाली मोटरसाइकिलें भी उपलब्ध कराई गई हैं। बोह निवासी पप्पू राम और नीलम देवी ने 38 लाख रुपए की लागत से ‘बोह वैली फिश फार्म एंड हैचरी’ स्थापित कर एक मिसाल कायम की है। उन्हें सरकार से 15 लाख रुपए की सब्सिडी मिली है। उनकी हैचरी में बीज डाला जा चुका है, जिससे अब पूरे क्षेत्र को गुणवत्तापूर्ण ट्राउट बीज स्थानीय स्तर पर ही मिल सकेगा। मत्स्य विभाग पालमपुर के सहायक निदेशक डॉ. राकेश कुमार ने बताया कि बेहतर उत्पादन के लिए डेनमार्क से उच्च नस्ल का ट्राउट बीज मंगवाया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि क्षेत्र के 15-20 लोग पहले ही उत्पादन शुरू कर चुके हैं और अब स्थानीय स्तर पर ही बीज उपलब्ध होने से लागत में कमी आएगी। डेनमार्क से आया स्पेशल बीज
मत्स्य विभाग पालमपुर के सहायक निदेशक डॉ. राकेश कुमार ने बताया कि, बेहतर उत्पादन के लिए डेनमार्क से उच्च नस्ल का ट्राउट बीज मंगवाया गया है। क्षेत्र के 15-20 लोग पहले ही उत्पादन शुरू कर चुके हैं। अब स्थानीय स्तर पर ही बीज उपलब्ध होने से लागत कम होगी। आत्मनिर्भरता के 4 पिलर टूरिज्म: फिशिंग और लोकल डिशेज से पर्यटकों की आमद बढ़ेगी। रोजगार: पलायन रुकेगा, युवाओं को अपने गांव में काम मिलेगा। संसाधन: बहते हुए शीतल पानी (खबरू फॉल) का सही इस्तेमाल। इकोनॉमी: ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

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