हिमाचल प्रदेश की पहचान माने जाने वाले ‘सेब’ पर क्लाइमेट चेंज की मार अब साफ दिखने लगी है। डॉ. वाइएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के क्लाइमेट चेंज विभाग के हेड एवं प्रोफेसर सतीश भारद्वाज ने चेतावनी दी कि एपल बेल्ट में तापमान में लगातार हो रहा उछाल सेब के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। उन्होंने कहा- पिछले कुछ सालों से जैसे रुझान नजर आ रहे हैं, उसे देखते हुए सेब पर निर्भर नहीं रहना होगा। बागवानों को दूसरे फलों की तरफ जाना होगा। निचले इलाकों से एपल बेल्ट शिफ्ट हो रहा है। बता दें कि इस साल शिमला में 16 जनवरी को न्यूनतम तापमान 10.5 डिग्री और चौपाल में 10.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। शिमला का तापमान सामान्य से 7.4 डिग्री ज्यादा था। डॉ. भारद्वाज के मुताबिक यह स्थिति सेब के लिए खतरनाक है। उन्होंने बताया- सेब की अच्छी फसल के लिए सर्दियों में पर्याप्त ठंड (चिलिंग) और बर्फबारी जरूरी होती है, मगर दो तीन सालों से तापमान बढ़ने के कारण चिलिंग पूरी नहीं हो पा रही। उन्होंने बताया- अब तक भी पिछले साल की अपेक्षा काफी कम चिलिंग हुई है। बागवानों की चिंताएं बढ़ी इससे सेब बागवान भी चिंता में है। वैज्ञानिकों के मुताबिक- चिलिंग पूरी न होना सेब उत्पादन के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इससे न केवल फ्लावरिंग (फूल आने की प्रक्रिया) प्रभावित होती है, बल्कि फलों के रंग, आकार और गुणवत्ता पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। उन्होंने बताया- सर्दियों में तापमान में हर साल उछाल आ रहा है। साल 2023 में भी जनवरी-फरवरी में तापमान में उछाल ने 100 सालों के रिकॉर्ड तोड़े थे। इस बार बीच में तापमान सामान्य से काफी ज्यादा रहा है। हर साल सर्दियों में तापमान बढ़ना अब एक सामान्य ट्रेंड बनता जा रहा है। इससे खासकर 6000 फुट से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों की सेब बेल्ट पर ज्यादा संकट आ सकता है। इन फलों की खेती पर ध्यान देने की जरूरत डॉ. सतीश भारद्वाज ने कहा- सेब के अलावा दूसरे फल जैसे अनार, कीवी, नाशपाती, आड़ू, प्लम इत्यादि फसलों के विकल्प तलाशने की जरूरत है। एक सेब पर निर्भर न रहे। उन्होंने बागवानों को क्रॉप डाइवरसीफिकेशन करने की सलाह दी। उन्होंने कहा- यदि सेब ही लगाना है तो कम चिलिंग अवधि वाली सेब की किस्में लगाई जाए, क्योंकि सेब की पुरानी किस्मों के लिए 1200 से 1500 घंटे की चिलिंग जरूरी होती है, लेकिन नई वेरायटी के लिए 300 से 500 घंटे की चिलिंग आवश्यक होती है। पहले जो चेंज 100 साल में होते थे, अब 10 वर्ष में हो रहे: भारद्वाज डॉ. भारद्वाज ने क्लाइमेट चेंज ग्लोबल समस्या है। पहले जो जलवायु परिवर्तन 100 वर्षों में होता था, वह अब 10 वर्षों के भीतर देखने को मिल रहा है। इसके पीछे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, बढ़ता परिवहन, औद्योगिक गतिविधियां और शहरीकरण जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं। बर्फबारी में कमी और तापमान में लगातार वृद्धि इसी का नतीजा है। 6000 फुट से निचले क्षेत्रों में ज्यादा खतरा: बिष्ट प्रोग्रेसिव ग्रोअर एसोसिएशन (PGA) के अध्यक्ष एवं बागवान लोकेंद्र बिष्ट ने बताया- जलवायु परिवर्तन की सेब की खेती पर बड़ी मार पड़ रही है। इसका ज्यादा असर 6000 फुट से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर पड़ रहा है। चिलिंग पूरी नहीं होने से प्लांट डॉरमेंसी में नहीं जा पा रहे। इससे फंगल डिजीज लग रहे हैं। पहले जब तापमान माइनस में जाता था तो सारे कीड़े-मकौड़े मर जाते थे। 5500 करोड़ के सेब उद्योग पर संकट हिमाचल में सेब उद्योग 5500 करोड़ रुपए का है। प्रदेश में 2.50 लाख से अधिक परिवार सीधे तौर पर सेब की खेती पर निर्भर हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन का असर केवल फसलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।