हिमाचल प्रदेश में कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट पीरियड की सीन्यॉरिटी और फाइनेंशियल बेनिफिट नहीं मिलने के मामले में आज हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। इस केस में अदालत आज अंतिम फैसला सुना सकती है। इससे पहले, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट कर्मचारियों को नियुक्ति तिथि से सीन्यॉरिटीऔर वित्तीय लाभ देने के आदेश दे चुका है। मगर राज्य सरकार ने बीते साल विधानसभा में विधेयक लाकर कॉन्ट्रैक्ट पीरियड की सीन्यॉरिटी और वित्तीय लाभ नहीं देने का फैसला लिया है। कर्मचारियों ने इसे कोर्ट में चुनौती दे रखी है। कर्मचारियों का कहना है कि सरकार ने 2003 के बाद उन्हें कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त किया था। समय-समय पर उन्हें नियमित किया गया। कॉन्ट्रैक्ट अवधि को जब रेगुलर सेवा के साथ नहीं जोड़ा गया और वित्तीय लाभ नहीं दिए गए तो उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। सरकार ने संविधान बदलने की कोशिश की: कर्मचारी कर्मचारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी और जीते भी। मगर सरकार ने फाइनेंशियल बेनिफिट और सीन्यॉरिटी वापस लेने के लिए असंवैधानिक अधिनियम लाया गया। सरकार ने अधिनियम लाकर न केवल उनके वित्तीय लाभ छीनने की कोशिश की, बल्कि संविधान को बदलने का प्रयास भी किया है जो उनके क्षेत्राधिकार में नहीं आता। न्यायपालिका में अतिक्रमण की दी दलील कर्मचारियों ने अदालत में दलील दी गई कि सरकार न्यायिक पालिका पर अतिक्रमण कर रही है क्योंकि अदालत के निर्णयों को केवल अदालती निर्णयों से ही बदला या पलटा जा सकता है। कर्मचारियों का कहना है कि हिमाचल प्रदेश भर्ती और सरकारी कर्मचारियों की सेवा की शर्त अधिनियम, 2024 (एक्ट) लाई है जिसकी आड में हाईकोर्ट सहित सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का अतिक्रमण करने की कोशिश की जा रही है। सरकार हारी तो पड़ेगा करोड़ों का बोझ वहीं, हाईकोर्ट में यदि सरकार हार गई तो अनुबंध कर्मियों को कॉन्ट्रैक्ट पीरियड की सीन्यॉरिटीऔर फाइनेंशियल बैनिफिट देने पड़ेंगे। इससे राज्य सरकार पर करोड़ों रुपए का वित्तीय बोझ पड़ेगा। इसी तरह, सरकार जीत गई तो कर्मचारियों के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला रहेगा।

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