हिमाचल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की सैलरी उसके जूनियर से कम है और इसकी वजह दोनों कर्मचारियों की ओर से वेतन निर्धारण के लिए चुने गए अलग-अलग विकल्प हैं, तो सीनियर कर्मचारी अपने जूनियर के बराबर वेतन करने की मांग नहीं कर सकता। इसके बाद कोर्ट ने चुनाव विभाग में तहसीलदार के पद पर कार्यरत सुभाष कुमार की याचिका खारिज कर दी। दिसंबर 2025 के वेतन रिकॉर्ड के अनुसार, सुभाष कुमार का मूल वेतन 65,800 रुपए था, जबकि उनके जूनियर बाल किशन की मूल सैलरी 69,800 रुपए थी। दरअसल, सुभाष कुमार और बाल किशन वर्ष 1991 में चुनाव विभाग में पटवारी भर्ती हुए थे। दोनों को वर्ष 2010 में कानूनगो, 2016 में नायब तहसीलदार और मार्च 2022 में तहसीलदार के पद पर पदोन्नति मिली। सुभाष कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उनकी सैलरी उनके जूनियर से 4,000 रुपए कम है। उन्होंने मांग की कि उनका वेतन भी बाल किशन के बराबर किया जाए। उनका आरोप था कि वर्ष 2010 में प्रमोशन के समय उन्हें वेतन निर्धारण का विकल्प नहीं दिया गया था। वेतन में अंतर कैसे आया? सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों कर्मचारियों को वेतन निर्धारण का विकल्प दिया गया था, लेकिन दोनों ने अलग-अलग विकल्प चुने सुभाष कुमार ने 15 जून 2010 से अपना वेतन तय करवाने का विकल्प चुना, जबकि बाल किशन ने पटवारी के पद पर अगली सालाना वेतन वृद्धि मिलने के बाद, यानी 1 जनवरी 2011 से वेतन तय करवाने का विकल्प चुना। इससे बाल किशन की सैलरी सुभाष कुमार से अधिक हो गई। जनवरी 2022 में भी दोनों ने अलग अलग विकल्प चुने जनवरी 2022 में नए वेतन नियम लागू होने पर भी दोनों ने अलग-अलग विकल्प चुने। सुभाष कुमार ने 2.59 के फैक्टर के आधार पर वेतन संशोधन का विकल्प चुना, जबकि बाल किशन ने 15 प्रतिशत वेतन वृद्धि से जुड़े दूसरे प्रावधान का विकल्प अपनाया। इससे दोनों के वेतन में अंतर बना रहा। हाईकोर्ट ने क्या कहा? जस्टिस ज्योत्सना रिवाल दुआ ने कहा कि हिमाचल प्रदेश सिविल सर्विसेज (रिवाइज्ड पे) रूल्स, 2022 के नियम 9(2) के तहत यदि सीनियर और जूनियर के वेतन में अंतर उनके द्वारा चुने गए अलग-अलग विकल्पों के कारण आया है, तो सीनियर कर्मचारी का वेतन बढ़ाकर जूनियर के बराबर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी पाया कि जूनियर कर्मचारी को कोई अतिरिक्त वेतन वृद्धि या एसीपी का विशेष लाभ नहीं मिला था। इसलिए वेतन में अंतर का कारण सुभाष कुमार की ओर से चुने गए विकल्प थे, न कि जूनियर को मिला कोई अतिरिक्त लाभ। देरी से कोर्ट पहुंचने का पहलू भी अहम सुभाष कुमार ने वर्ष 2019 में पहली बार विभाग के समक्ष वेतन अंतर का मामला उठाया था। विभाग ने वर्ष 2020 में उनकी मांग खारिज कर दी थी। इसके बाद वह करीब छह साल बाद हाईकोर्ट पहुंचे।