हिमाचल प्रदेश में ‘टॉयलेट टैक्स’ के बाद अब ‘चूल्हा टैक्स’ को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। शिमला जिले के रोहड़ू की शील पंचायत की ओर से सालाना 200 रुपए ‘चूल्हा टैक्स’ वसूली की पर्ची सामने आने के बाद लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर पंचायतें यह टैक्स क्यों ले रही हैं और इससे जुटाई गई राशि कहां खर्च होती है। ‘दैनिक भास्कर एप’ ने जब इस मामले की पड़ताल की तो सामने आया कि यह वसूली नई नहीं है। रोहड़ू के खंड विकास अधिकारी (BDO) और शील पंचायत के सेक्रेटरी के मुताबिक, पंचायतों में यह राशि पहले से ली जा रही है। हालांकि, रसीद पर ‘चूल्हा टैक्स’ लिखे होने से यह मामला चर्चा में जरूर आया है। BDO रोहड़ू के अनुसार, पहले राशन कार्ड रिन्यूल के दौरान ही यह टैक्स ले लिया जाता था। ऐसे में लोगों को अलग से टैक्स देने का एहसास नहीं होता था। अब राशन कार्ड डिजिटल व ऑनलाइन बनने लगे हैं, इसलिए पंचायतें प्रॉपर्टी टैक्स की अलग रसीद काट रही हैं। इससे लोगों को लग रहा है कि नया टैक्स लगा दिया गया है, जबकि यह पुरानी व्यवस्था है। पड़ताल के दौरान सामने आया कि जिन पंचायतों ने इसकी वसूली नहीं की, वहां ऑडिट ऑब्जेक्शन में भी यह बात सामने आई है और पंचायतों को प्रॉपर्टी टैक्स लेने को कहा गया है। केंद्र सरकार भी बार बार अपने रिसोर्स जनरेट करने को कह रही है। कहीं 50 तो कहीं 100 और 200 रुपए तक वसूली राज्य की पंचायतों में प्रॉपर्टी टैक्स की दर एक जैसी नहीं है। कुछ पंचायतों में 50 रुपए, कहीं 100 रुपए तो कहीं 200 रुपए सालाना तक ले रही है। स्थानीय स्तर पर इस राशि को कुछ जगह चूल्हा टैक्स और कुछ जगह प्रॉपर्टी टैक्स कहा जा रहा है। हालांकि, प्रदेश की कितनी पंचायतों में यह टैक्स लिया जा रहा है, कुल कितनी राशि जमा हुई है और कितनी पंचायतों में इसकी वसूली लंबित है, इसका आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध होना जरूरी है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि व्यवस्था कितनी व्यापक है और पंचायतवार दरों में अंतर किस आधार पर है। शील पंचायत के सचिव बोले- टैक्स पुराना, नाम से हो रहा विवाद शील पंचायत के सेक्रेटरी देवेंद्र बख्शी ने बताया कि पंचायत में सालाना 200 रुपए प्रॉपर्टी टैक्स लिया जा रहा है। यह पहले से वसूला जा रहा है। उनके अनुसार, रसीद पर ‘चूल्हा टैक्स’ लिखे होने के कारण विवाद हो रहा है। उनका कहना है कि टैक्स नया नहीं है, बल्कि इसकी वसूली पहले से होती रही है। शील पंचायत के प्रधान निरंजन ने बताया कि पहले राशन कार्ड रिन्यूल के दौरान हर साल लिया जाता था। अब राशन कार्ड डिजीटली बन रहे है। इसलिए यह टैक्स पर्ची के माध्यम से काटा जा रहा है। उन्होंने बताया कि हम सैग्रीकेशन प्लांट लगा रहे हैं। उसे चलाने व कूड़ा-कटचे का वैज्ञानिक विधि से डिस्पोज ऑफ करने के लिए यह टैक्स लिया जा रहा है। सोशल मीडिया पर उठे वसूली और खर्च पर सवाल चूल्हा टैक्स की रसीद सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग इसकी कानूनी स्थिति, अलग-अलग पंचायतों में दरों और वसूली गई राशि के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठा रहे हैं। शील पंचायत निवासी हरीश चौहान ने अपनी पंचायत से टैक्स की रसीद मिलने के बाद सोशल मीडिया पोस्ट लिखकर पूछा कि ग्रामीण परिवारों से वसूली गई राशि का इस्तेमाल कहां और किस तरह किया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कई गांवों में गलियां और रास्ते बदहाल हैं तथा स्ट्रीट लाइटें खराब पड़ी हैं, तो टैक्स से जुटाई गई राशि का हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता। पोस्ट में सरकार से टैक्स का कानूनी आधार स्पष्ट करने, पंचायतवार दरें बताने, सालाना आय-व्यय का विवरण सार्वजनिक करने और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत देने पर विचार करने की मांग की गई है। हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी हिमाचल का टॉयलेट टैक्स मुद्दा बना बता दें कि लगभग दो साल पहले भी हिमाचल में टॉयलेट टैक्स का मामला भी खूब गर्म हुआ था। उस दौरान हिमाचल का टॉयलेट टैक्स हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी मुद्दा बना था। बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने इस मुद्दे को कई जनसभाओं में उठाया।