हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के चुराह क्षेत्र के मांजू स्कूल में टीचर नरेंद्र कुमार की शुक्रवार को ट्रांसफर पर ऐसी भावुक विदाई हुई कि वहां मौजूद बच्चों की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। अपने प्रिय गुरुजी की ट्रांसफर का दर्द लेकर घर पहुंचे कुछ बच्चे खाना तक नहीं खा रहे। टीचर की विदाई के वक्त बच्चों का दर्द उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। बच्चे फूट-फूटकर रोए। स्टूडेंट्स के साथ स्कूल का स्टाफ भी भावुक हो गया। नरेंद्र कुमार ने सभी बच्चों को बारी-बारी गले से लगाया। इस पल का वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। नरेंद्र कुमार 12 जून 2006 से (19 साल) मांजू स्कूल में सेवाएं दे रहे थे। उनका बच्चों के साथ गहरा जुड़ाव हो गया था। ट्रांसफर के बाद जब विदाई की घड़ी आई तो बच्चे अपने प्रिय गुरुजी से बिछड़ने का गम बर्दाश्त नहीं कर पाए। ‘मैंने फिर से आ जाना बेटा…’ वीडियो में शिक्षक रोते-बिलखते बच्चों को दिलासा देते हुए कहते सुनाई दे रहे हैं, ‘मैंने फिर से आ जाना बेटा…, ठीक है।’ बच्चों को इस कदर रोता देखकर नरेंद्र कुमार भी भावुक हो जाते हैं। वह बच्चों से कहते हैं, ‘तुम तो मेरी जान ले लोगे।’ शिक्षक के इन शब्दों से बच्चों के साथ उनका भावनात्मक रिश्ता साफ झलकता है। विदाई के वक्त मौजूद 30 से ज्यादा बच्चों को टीचर अपने गले लगाते हैं और उनके माथे को चूमते हुए आगे बढ़ते हैं। इस दौरान स्कूल परिसर में मौजूद दूसरे शिक्षक भी बच्चों को समझाते हैं। 19 साल का साथ, विदाई में छलका प्यार वीडियो के आखिर में ट्रांसफर होने वाले शिक्षक स्कूल के दूसरे स्टाफ से भी गले मिलते हैं। इस दौरान स्टाफ के बीच भी भावुक माहौल नजर आता है। लंबे समय तक एक ही स्कूल में साथ काम करने के बाद सहयोगियों से विदाई का यह पल भी भावनाओं से भरा रहा। यह विदाई सिर्फ एक शिक्षक की ट्रांसफर का दृश्य नहीं, बल्कि गुरु और शिष्य के बीच बने उस रिश्ते की तस्वीर है, जो पढ़ाई से आगे बढ़कर अपनापन और विश्वास का रूप ले लेता है। मांजू स्कूल में बच्चों का अपने शिक्षक के प्रति यह लगाव दिखाता है कि एक शिक्षक का विद्यार्थियों के जीवन में कितना गहरा स्थान हो सकता है। बच्चों के पेरेंट्स वापस आने को कह रहे: नरेंद्र नरेंद्र कुमार ने बताया कि उनकी ट्रांसफर के बाद बच्चों के पेरेंट्स उन्हें फोन कर कह रहे हैं कि बच्चे खाना नहीं खाएंगे। कुछ ने तो कॉपी-किताबें फाड़ने की भी बात कही। इस पर नरेंद्र ने खुद बच्चों को भरोसा दिलाया कि दो महीने रुक जाएं। दरअसल, नरेंद्र कुमार की पहली नियुक्ति प्राइमरी स्कूल मांजू में हुई थी। तब से वह इसी स्कूल में सेवाएं दे रहे हैं। उन्हें डर था कि लंबे समय तक एक ही स्कूल में रहने के कारण कहीं उनका दूर-दराज के क्षेत्र में ट्रांसफर न कर दिया जाए। इसलिए उन्होंने अपनी विलिंग देकर जसोरगढ़ प्राइमरी स्कूल में ट्रांसफर करवाई। मगर यह बात मांजू स्कूल के बच्चों को अच्छी नहीं लगी। नरेंद्र ने बताया कि बच्चों की भावनाओं को देखते हुए वह नए शैक्षणिक सत्र से दोबारा मांजू स्कूल में अपना ट्रांसफर करवाने की कोशिश करेंगे।

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