हिमाचल प्रदेश का अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा 21 से 27 अक्टूबर तक चलेगा। 347 देवी-देवताओं और 20 देशों के कलाकारों को निमंत्रण दिया गया है। कुछ देवता 150 से 200 किलोमीटर की पैदल यात्रा करके कुल्लू के ढालपुर मैदान पहुंचेंगे। हालांकि इस बार फेस्टिवल से पहले देवताओं की प्रामाणिकता और कारदार की भूमिका पर विवाद हो गया। देव संस्कृति चैरिटेबल संस्था के अध्यक्ष ओम प्रकाश शर्मा ने करीब 136 कारदारों और उनसे संबंधित देवी-देवताओं की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आयोजन समिति पर भी सवाल उठाए और कहा कि मौजूदा कार्यकारिणी का कार्यकाल 30 नवंबर 2024 को समाप्त हो गया। लिहाजा, इसके बाद लिए गए फैसलों की समीक्षा होनी चाहिए। वहीं, जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर ने आरोपों को खारिज किया। उनका कहना है कि संघ में सभी 13 खंडों के कारदार शामिल हैं और गैर-माफीदार देवी-देवताओं (ऐसे देवस्थान जिन्हें राजा या रियासत की ओर से जमीन, लगान में छूट या अन्य राजस्व संबंधी रियायत मिली हो) को भी संविधान के तहत सदस्यता का अधिकार है। उनके अनुसार, 25 सितंबर 2026 को आयोजित जनरल हाउस में जिला और खंड कार्यकारिणियों को सर्वसम्मति से 31 मार्च 2027 तक सेवा विस्तार दिया गया है। चुनाव 30 अप्रैल 2027 तक करवाए जाएंगे। बजंतरियों के नजराने पर मतभेद देवी-देवताओं के साथ पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाने वाले बजंतरियों के नजराने का भुगतान भी विवादों में है। देव संस्कृति चैरिटेबल संस्था और बजंतरी संघ की मांग है कि उत्सव में भाग लेने वाले प्रत्येक बजंतरी को पहले दिन ही उसके बैंक खाते में नजराने की राशि दी जाए। उनका तर्क है कि बजंतरी पूरे सात दिन सेवा करते हैं और इनमें कई परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं। ऐसे में भुगतान के लिए उत्सव के समापन तक इंतजार करने से उन्हें परेशानी होती है। संबंधित फार्म का सत्यापन कारदार करेंगे दूसरी ओर, कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर के अनुसार, दशहरा उत्सव समिति के अध्यक्ष सुंदर सिंह ठाकुर की मौजूदगी में कारदार संघ और बजंतरी संघ के बीच सहमति बनी है कि नजराने का भुगतान दशहरा समापन पर किया जाएगा। संबंधित फार्म का सत्यापन कारदार करेंगे। इस मुद्दे पर अलग-अलग पक्षों के दावों के बीच भुगतान की अंतिम प्रक्रिया, बैठक की कार्यवाही और संबंधित नियमों की पुष्टि महत्वपूर्ण होगी। कुल्लू में रावण पुतले का दहन नहीं कुल्लू दशहरा देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से अलग है। यहां विजयादशमी पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले नहीं जलाए जाते, बल्कि घाटी के देवी-देवता भगवान रघुनाथ जी के समक्ष हाजिरी लगाने ढालपुर पहुंचते हैं। उत्सव की शुरुआत रघुनाथ जी की रथयात्रा से होगी। इसके बाद देव मिलन, पारंपरिक जलेब, सांस्कृतिक संध्याएं और समापन के दिन ब्यास नदी के किनारे प्रतीकात्मक लंका दहन होगा। यह रथयात्रा 21 अक्टूबर को निकलेगी। इसमें पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों पर नाचते-गाते हुए देवता आगे बढ़ेंगे। रथयात्रा के साथ ड्रोन शो, लेजर शो और ग्लोबल डांस प्रोग्राम उत्सव के आकर्षण होंगे। विदेशी कलाकारों के साथ कुल्लवी संस्कृति का प्रदर्शन उत्सव समिति के अध्यक्ष एवं विधायक सुंदर सिंह ठाकुर के अनुसार, इस बार कुल्लू दशहरे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोक कला और संस्कृति के बड़े मंच के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी है। पारंपरिक नाटी, लालड़ी, लोक संगीत, पारंपरिक वेशभूषा, कुल्लवी शॉल और हस्तशिल्प के साथ ड्रोन व लेजर शो आधुनिक आकर्षण होंगे। 1660 से दशहरे का आयोजन कुल्लू दशहरे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 17वीं शताब्दी में राजा जगत सिंह के शासनकाल से जुड़ी मानी जाती है। लोकमान्यता के अनुसार, वर्ष 1651 में भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति अयोध्या से कुल्लू लाई गई थी। इसके बाद भगवान रघुनाथ जी को कुल्लू रियासत का प्रमुख आराध्य मानकर दशहरे की परंपरा विकसित हुई। उत्सव की शुरुआत सामान्यतः 1660 के आसपास मानी जाती है। राजपरिवार के छड़ीबरदार की भूमिका और माता हिडिंबा की उपस्थिति भी इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ड्रोन, हॉट एयर बैलून और पैराग्लाइडिंग पर प्रतिबंध उत्सव क्षेत्र और आसपास ड्रोन, पैराग्लाइडिंग तथा हॉट एयर बैलून जैसी हवाई गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। इनके संचालन के लिए पुलिस अधीक्षक कुल्लू से पूर्व लिखित अनुमति लेना अनिवार्य बताया गया है।