हिमाचल प्रदेश में सरकारी आवासों के नियमों के खिलाफ आवंटन और लंबे समय से कब्जों को लेकर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। स्वतः संज्ञान के तहत ली गई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पूर्व मुख्य संसदीय सचिवों को दिए गए विशेष लाभ और सरकारी अधिकारियों की कीमत पर पत्रकारों को बांटे गए मकानों पर सवाल उठाए हैं। इसे लेकर कोर्ट ने सरकार से पूरा रिकॉर्ड मांगा है और पिछले नोटिस पर सरकार की ओर से हलफनामा दाखिल नहीं करने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई है। अब राज्य सरकार को पूर्व CPS और पत्रकारों को दिए गए सरकारी आवासों का पूरा ब्योरा अगली सुनवाई में देना होगा। मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर 2026 को होगी। यह मामला 5 अगस्त, 2026 की सुनवाई में सामने आया था कि सरकार ने सरकारी आवास आवंटन नियम, 1994 के नियम 24 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर 6 पूर्व CPS के सरकारी आवासों में रहने को नियमित किया था। खास बात यह थी कि इन लोगों ने इसके लिए कोई आवेदन तक नहीं किया था। चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने सरकार को नया हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। सरकार ने सीपीएस के आवास बिना आवेदन रेगुलर किए इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया था कि बिना आवेदन के 6 लोगों को यह विशेष सुविधा किस आधार पर दी गई। कोर्ट ने यह भी पूछा था कि क्या सरकार ने अपनी शक्तियों का मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया है। अदालत ने मुख्य सचिव से हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा था कि पहले भी कितने कर्मचारियों को ऐसी विशेष अनुमति दी गई और इन छह पूर्व CPS को बिना आवेदन के यह लाभ क्यों दिया गया। सरकार ने अब तक नहीं दिया पूरा जवाब पिछली सुनवाई में कोर्ट के निर्देश के बावजूद राज्य सरकार अपना हलफनामा दाखिल नहीं कर पाई। इसी दौरान अदालत को बताया गया कि राज्य में बड़ी संख्या में सरकारी आवास पत्रकारों को भी दिए गए हैं। आरोप है कि इन आवासों पर पत्रकारों का कब्जा अन्य सरकारी अधिकारियों की कीमत पर है।