हिमाचल प्रदेश में भेड़ पालन क्षेत्र को बढ़ावा देने और पशुपालकों की आय में वृद्धि करने के लिए एक बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग शुरू किया गया है। राज्य सरकार ने राज्य में ऊन उत्पादन को मौजूदा 1,500 टन से बढ़ाकर साल 2027 तक 3,000 टन (दोगुना) करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इसके लिए ऑस्ट्रेलियाई मेरिनो भेड़ों का स्थानीय गद्दी नस्ल की भेड़ों के साथ संकरण कराया जा रहा है। इस परियोजना के तहत वर्ष 2021 में मंडी जिले के नागवेन स्थित सरकारी भेड़ प्रजनन फार्म में 240 मेरिनो भेड़ें लाई गई थीं। तैयार हुए 800 संकर मेमने, भरमौर में होगी पहली परीक्षा इस सरकारी परियोजना के तहत अब तक फार्म में लगभग 800 संकर (क्रॉस-ब्रीड) मेमने तैयार किए जा चुके हैं। प्रयोग के अगले चरण के तहत इनमें से 52 मेमनों को चंबा जिले के भरमौर भेजा गया है। इन मेमनों के जरिए ऊन की गुणवत्ता में सुधार और भेड़ पालकों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। संकर ऊन से पशुपालकों को मिलेगी 4 गुना तक अधिक कीमत आंकड़ों के अनुसार, पारंपरिक गद्दी भेड़ की ऊन आमतौर पर 27 माइक्रोन (मोटी) होती है, जबकि मेरिनो के साथ संकरण के बाद यह 21-22 माइक्रोन तक बेहद महीन हो जाएगी। महीन ऊन की बाजार में भारी मांग है। देसी ऊन की कीमत 12-15 रुपये प्रति किलोग्राम और संकर ऊन की संभावित कीमत 40-70 रुपये प्रति किलोग्राम तक (यानी सीधे 4 गुना तक का मुनाफा) हो सकती है। कठिन पहाड़ी चरागाहों और मौसम की असली चुनौती भले ही यह प्रयोग कागजों और सरकारी फार्म में सफल दिख रहा हो, लेकिन असली चुनौती पहाड़ी चरागाहों में होगी। गद्दी नस्ल की भेड़ें कठिन पहाड़ी रास्तों और बदलते मौसम में लंबी दूरी तय करने के लिए अनुकूलित (Adapt) होती हैं, जबकि ऑस्ट्रेलियाई मेरिनो को अत्यधिक देखभाल की जरूरत होती है। पशुपालकों को चिंता है कि: अत्यधिक बारिश में मेरिनो की घनी और मुलायम ऊन पानी सोख लेगी, जिससे उन्हें त्वचा संक्रमण और निमोनिया का खतरा हो सकता है। हिमाचल के पथरीले रास्तों और कटीली झाड़ियों में मेरिनो के नरम खुर जख्मी हो सकते हैं। मूल गद्दी नस्ल और पारंपरिक उत्पादों पर संकट का सवाल इस परियोजना के सामने सबसे बड़ा सवाल देसी गद्दी नस्ल के संरक्षण का भी है। विशेषज्ञों और पशुपालकों को आशंका है कि यदि अधिक मुनाफे के चक्कर में बड़े पैमाने पर संकरण हुआ तो धीरे-धीरे शुद्ध गद्दी नस्ल विलुप्त हो सकती है। हिमाचल की संस्कृति से जुड़े पारंपरिक उत्पाद जैसे उनाली कोट और पट्टू प्रभावित हो सकते हैं, जिनमें केवल गद्दी भेड़ की पारंपरिक ऊन का ही इस्तेमाल होता है। बाजार में सुधार भी है बेहद जरूरी जानकारों का मानना है कि केवल नस्ल बदलने से पशुपालकों की तकदीर नहीं बदलेगी। ऊन की गुणवत्ता सुधारने के साथ-साथ सरकार को पशुपालकों के लिए सीधी बाजार पहुंच (Market Access), ऊन प्रसंस्करण (Processing Units) और भेड़ पालकों को संगठित करने पर भी काम करना होगा। वूल फेडरेशन के चेयरमैन का बयान वूल फेडरेशन के चेयरमैन मनोज कुमार ने बताया कि नस्ल सुधार का मुख्य उद्देश्य पशुपालकों की आय बढ़ाना है। मेरिनो के संकरण को पहाड़ी परिस्थितियों में पूरी तरह परखा जाएगा। इस दौरान पशुपालकों की राय, देसी नस्ल और पारंपरिक व्यवस्था का पूरा ध्यान रखा जाएगा। नई नस्ल का प्रदर्शन पूरी तरह संतोषजनक रहने के बाद ही इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाएगा।

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