वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पति के दूर के रिश्तेदारों को बिना ठोस वजह आपराधिक मामले में घसीटने पर सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाकर किसी रिश्तेदार के खिलाफ 498-A जैसे गंभीर आपराधिक मामले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। यह मामला एक महिला डॉक्टर और उसके पति में वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। शादी के कुछ समय बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया था। महिला ने पति, सास और परिवार के अन्य लोगों पर दहेज प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। क्या था मामला? मामले में पति और उसकी मां मुख्य आरोपी थे। दोनों बाद में भारत छोड़कर विदेश चले गए और वहां के स्थायी नागरिक बन गए। अदालत उन्हें पहले ही भगोड़ा अपराधी घोषित कर चुकी थी। इसके बाद भारत में रह रही पति की सगी मौसी के खिलाफ भी मामला दर्ज कराया गया। मौसी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए कहा कि उन्हें केवल इसलिए केस में फंसाया गया है, ताकि विदेश में रह रहे मुख्य आरोपियों पर भारत लौटने का दबाव बनाया जा सके। महिला की FIR में आरोप था कि पति की मौसी और सास के बीच करीबी संबंध थे और दोनों शादी के बाद से उसे कम दहेज लाने, साधारण होटल में शादी करने, खराब मेकअप और पहनावे को लेकर ताने देती थीं। कोर्ट ने आरोपों में क्या पाया? हाईकोर्ट ने FIR और मामले से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की। कोर्ट ने पाया कि पति की मौसी के खिलाफ किसी ऐसी ठोस घटना का उल्लेख नहीं था, जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर दहेज की मांग की हो या प्रताड़ना की हो। FIR में घटना की स्पष्ट तारीख, समय और स्थान भी नहीं बताया गया था। कोर्ट ने माना कि लगाए गए आरोप काफी हद तक सामान्य और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे। हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया? इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पति की मौसी के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी। उनके खिलाफ निचली अदालत में चल रही आपराधिक कार्यवाही को भी खत्म कर दिया गया। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि वैवाहिक विवादों में सीधे FIR दर्ज करने से पहले पुलिस को प्रारंभिक जांच के संबंध में स्थापित कानूनी सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। यानी, इस मामले में हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि 498-A के सभी मामले गलत होते हैं। कोर्ट का जोर इस बात पर था कि किसी रिश्तेदार के खिलाफ कार्रवाई के लिए उसके खिलाफ ठोस और विशिष्ट आरोप तथा प्रथम दृष्टया सामग्री होनी चाहिए।