चंपत राय ने लापरवाही की और राम मंदिर को अपनी रियासत की तरह चलाया। अहंकार ने उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी थी, उनको न कुछ दिखाई देता था, न सुनाई देता था। चंपत राय की निष्ठा में कमी नहीं थी, नीयत भी साफ थी, लेकिन निगरानी और नीति में भारी चूक हुई। 

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