लीची जोन घोषित हो चुके पठानकोट की लीची अब विदेशों में भी मिठास घोलने के लिए तैयार है। इस बार पठानकोट के बागवानों को इंटरनेश्नल मार्केट मिला है। जिनमें दुबई, इंग्लैंड, सिंगापुर, लंदन और ब्रिटेन के बाजार शामिल हैं। भारत सरकार के कृषि उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) और पंजाब सरकार के बागवानी विभाग के संयुक्त सहयोग से स्थानीय बागवानों को इसका सीधा फायदा मिल रहा है। पंजाब में 100 से 150 रुपए किलो में बिकने वाली लीची लंदन और ब्रिटेन में 1500 रुपए और दुबई में 650 रुपए प्रति किलोग्राम में बिक रही है। जिससे पठानकोट के बागबान बेहद खुश हैं। पठानकोट में मुख्य तौर पर कलकत्ती, देहरादूनी और सीडलेस किस्म की लीची की पैदावार होती है। जिसकी डिमांड विदेशों में की जा रही है। अधिकारियों और बागबानों का कहना है कि दुबई के शेख पठानकोट की कलकत्ती लीची के काफी शौकीन हैं। वहीं, ब्रिटेन में भी पठानकोट की लीची की काफी मांग है। पठानकोट में करीब 2,300 हेक्टेयर क्षेत्र में लीची उगाई जाती है। जिला बागवानी अधिकारी डॉ. जितेंद्र कुमार बताते हैं कि एपीडा के नार्थ के जोनल मैनेजर ने संपर्क साधा है जिनकी मदद से बागवानों की लीची विदेश भेजी जाएगी। 3 महीनों से पठानकोट में डेरा डाले हैं दिल्ली, यूपी के ठेकेदार
बता दें, पठानकोट की लीची की इतनी डिमांड है कि दिल्ली, कलकत्ता और यूपी के ठेकेदारों ने पठानकोट में डेरा डाल रखा है। ये ठेकेदार पूरे बाग का ठेका प्रति हेक्टेयर के हिसाब से करते हैं और अप्रैल से जून तक 3 महीने लगातार यहां बागों में रहकर लीची की देखभाल, तुड़ाई और पैकिंग का काम करते हैं। मल्लपुर के बागवान मुल्खराज शर्मा बताते हैं कि 18 लाख में 436 पेड़ों के बाग का ठेका यूपी के मोहम्मद शबीर को दिया है। मुल्ख राज का कहना है कि इन ठेकेदारों के माध्यम से लोकल लोगों खासकर घरेलू महिलाओं को रोजगार मिलता है। पठानकोट का पर्यावरण लीची को बनाता है विशेष
विशेषज्ञों का कहना है कि पठानकोट का पर्यावरण लीची को विशेष बनाता है। यही कारण है कि पंजाब की कुल पैदावार का 70 फीसदी उत्पादन केवल पठानकोट में ही होता है। यहां पैदा हुई लीची अन्य इलाकों के मुकाबले अधिक रसीली और मीठी होती है। पठानकोट में देहरादूनी तथा कलकत्तिया दोनों किस्म की लीची पैदा होती है जिसमें अच्छा तापमान मिलने के कारण दाने बड़े और लाल होते हैं जो एक्सपोर्ट के लिए बेहतर माना जाता है।
इससे पहले पिछले 3 साल से इक्का-दुक्का देशों में थोड़ी बहुत लीची निर्यात की जाती थी। लेकिन, इस बार विदेशों से अधिक डिमांड आने के कारण बड़े स्तर पर निर्यात किया जा रहा है। घरेलू बाजारों में भी सिरमौर पठानकोट की लीची
विदेशों में एक्सपोर्ट के अलावा घरेलू बाजार में भी पठानकोट की लीची की डिमांड दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। दिल्ली, बेंगलुरु, कोलकाता, मुंबई, पुणे हर साल हजारों टन लीची भेजी जाती है। वहां से सीधे व्यापारी यहां से लीची खरीदकर ले जा रहे हैं। बागबानों का कहना है कि रिलायंस व बिग बाजार भी लोकल लीची उठा रहे हैं। वहीं, पठानकोट कैंट रेलवे स्टेशन से 10 टन लीची लोडिंग कर बांद्रा टर्मिनस, सूरत, सहारनपुर और अहमदाबाद के लिए ट्रेन के एसएलआर द्वारा भेजी जा चुकी है। 2024 में पहली बार भेजी थी लंदन
जिला पठानकोट के अनूप शहर, मल्लपुर, जमालपुर, सरना, मुरादपुर, कोटली, कटारूचक्क, मामून, फूल प्यारा, शेरपुर, शरीफचक्क, सिहोड़ा, कथलौर, कीड़ी, दतियाल, तलूर में लीची के बागानों में इस समय लीची की तुड़ाई और ग्रेडिंग का काम तेजी पर है। लीची की खुशबू से बागान महक रहे हैं। साल 2024 में पहली बार पठानकोट के मुरादपुर के राजेश डढवाल की लीची लंदन एक्सपोर्ट की गई थी। 2025 में भी चकमाधो सिंह के प्रभात सिंह और राजेश डढवाल की 25 क्विंटल लीची दुबई एक्सपोर्ट हुई थी जो अमृतसर एयरपोर्ट से फ्लाइट से भेजी गई जिसमें एपीडा और पंजाब सरकार के बागवानी विभाग का सहयोग रहा। लंदन में 1500 रुपए के करीब बिकी
बागवानी विभाग के अधिकारियों के मुताबिक विदेशों में लीची की अच्छी कीमत मिल जाती है। लंदन में 1450 रुपए किलो तथा दुबई में 650 रुपए किलो की दर से लीची बिक जाती है। जिला बागवानी अधिकारी डॉ. जितेंद्र कुमार बताते हैं कि एपीडा के नार्थ के जोनल मैनेजर ने संपर्क साधा है जिनकी मदद से बागवानों की लीची लंदन, सिंगापुर और दुबई भेजी जाएगी। पठानकोट में स्थापित किया लीची एस्टेट
पठानकोट से सुजानपुर में लीची स्टेट स्थापित किया गया है। बागवानी विभाग द्वारा बागवानों को स्प्रे, पैकिंग और स्टोरेज में गाइड करता है। पैकिंग और परिवहन पर भी सब्सिडी दी जाती है। एक किसान को परिवहन सब्सिडी के तौर पर सरकार 20 हजार तथा बागान में लीची स्टोरेज को कोल्ड स्टोर बनाने पर 1.5 लाख तक की सब्सिडी दी जा रही है। कई बड़े किसानों ने सब्सिडी लेकर बागानों में स्टोरेज स्थापित किए हैं। पठानकोट में बढ़ी लीची की पैदावार और रकबा
पठानकोट में पिछले साल के मुकाबले लीची के उत्पादन में 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। पिछले साल 35000 मीट्रिक टन लीची का उत्पादन हुआ था जो इस बार 37000 मीट्रिक टन के करीब है। पठानकोट में करीब 2,300 हेक्टेयर क्षेत्र में लीची उगाई जाती है और प्रति हेक्टेयर 16000 किलो लीची की पैदावार होती है। हालांकि, इस बार कम बारिश, आंधी और कुछ एरिया में ओले पड़ने से कुछ नुकसान भी हुआ है।
प्रमुख बिंदु :
अंतरराष्ट्रीय भाव: लंदन में पठानकोट की लीची ₹1450 प्रति किलो और दुबई में ₹650 प्रति किलो की दर से बिक रही है।
उत्पादन में बढ़ोतरी: पिछले साल के मुकाबले इस साल लीची के उत्पादन में 10 फीसदी (10%) की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
कुल उत्पादन: पिछले वर्ष जहाँ 35,000 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ था, वहीं इस बार यह बढ़कर लगभग 37,000 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है।
रकबा: पठानकोट में लीची के बागानों का कुल क्षेत्रफल करीब 2300 हेक्टेयर है, जिसमें इस साल 150 हेक्टेयर की नई बढ़ोतरी हुई है। पैकिंग, परिवहन और स्टोरेज पर मिल रही है सब्सिडी
बागवानी विभाग द्वारा किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए भारी सब्सिडी दी जा रही है:
परिवहन सब्सिडी: किसानों को ट्रांसपोर्टेशन के लिए सरकार की तरफ से ₹20,000 की सब्सिडी दी जा रही है।
कोल्ड स्टोरेज: बागानों में लीची को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोर बनाने पर ₹1.5 लाख की सब्सिडी का प्रावधान है।
पठानकोट से सुजानपुर के बीच एक ‘लीची स्टेट’ भी स्थापित किया गया है, जहाँ किसानों को पैकिंग और स्प्रे के लिए गाइड किया जाता है।
बागवानों को पेश आ रही मुश्किलें
मल्लपुर के बागबान मुल्खराज शर्मा ने बताया कि भले पठानकोट में लीची की पैदावार बढ़िया होती है। लेकिन, अभी भी लीची की काश्त में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इनमें प्रमुख है:
नहरी पानी की कमी : पठानकोट के सभी लीची काश्तकारों को अगर नहरी पानी मिले तो जमीनी पानी का इस्तेमाल कम होगा।
अंडरग्राउंड बिजली सप्लाई : बागों से गुजरने वाली ओवरहेड तारों की बजाए अंडरग्राउंड तारें बिछाई जाएं तो पेड़ों का नुक्सान नहीं होगा और हवा से तारों के टकराने से बार-बार बिजली जाने की समस्या भी नहीं होगी।
सोलर सिस्टम के लिए सब्सिडी : काश्तकारों को सोलर पैनल के लिए सब्सिडी दी जाए, ताकि बिजली की बचत हो सके।
मशीनों पर सब्सिडी : काश्तकारों को लीची की जांच के लिए मशीनें सब्सिडी पर दी जाएं।
अवशेषों का न्यूट्रलाइजेशन : लीची की तुड़ाई डाल सहित होती है, ऐसे में काफी अवशेष बचते हैं, इसके न्यूट्रलाइजेशन का इंतजाम सरकार अपने स्तर पर करे।

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