हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक केंद्र धर्मशाला नगर निगम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एकतरफा और ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया है। कुल 17 वार्डों वाले इस नगर निगम में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 11 सीटों पर कमल खिलाया है। दूसरी ओर, प्रदेश की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है और वह महज 5 सीटों पर सिमट कर रह गई। इस चुनाव में 1 सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत दर्ज की है। 17 वार्डों वाले धर्मशाला नगर निगम में बहुमत के लिए जादुई आंकड़ा 9 सीटों का था, जिसे भाजपा ने 11 सीटें जीतकर आसानी से पार कर लिया है। अब नगर निगम में भाजपा का नया मेयर और डिप्टी मेयर बनना पूरी तरह तय है। इस बड़ी जीत से जहां भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल सातवें आसमान पर है, वहीं कांग्रेस को अपनी रणनीतियों पर नए सिरे से आत्ममंथन करना होगा। हिमाचल की सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहे यह चुनाव कांग्रेस के लिए बड़ा झटका साबित होने वाला है। सरकार के दम विकास के वादे के साथ चुनाव लड़ी कांग्रेस भाजपा के संगठन की मजबूती और ताकत के आगे बुरी तरह हार गई। हाल यह रहा कि यहां बड़े दिग्गज भी अपना गढ़ नहीं बचा पाए। मेयर और डिप्टी मेयर को भी हार का सामना करना पड़ा। दिग्गजों के किले ढहे: जनता ने चुना बदलाव इस चुनाव का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला पहलू पुराने राजनीतिक दिग्गजों की हार रहा। चुनाव मैदान में उतरे दो पूर्व मेयर और निवर्तमान डिप्टी मेयर अपनी सीटें बचाने में पूरी तरह नाकाम रहे। धर्मशाला के मतदाताओं ने इस बार पिछली उपलब्धियों और पुराने चेहरों को पूरी तरह नकारते हुए नए चेहरों और बदलाव के पक्ष में एकतरफा मतदान किया है। सुधीर शर्मा का बढ़ा कद, सुक्खू सरकार को झटका आगामी विधानसभा चुनावों का ‘सेमीफाइनल’ माने जा रहे इस चुनाव के नतीजे राज्य की राजनीति को नया मोड़ देने वाले हैं। इसमें स्थानीय विधायक सुधीर शर्मा का कद भाजपा में बढ़ा दिया है। कांग्रेस के पूरे जोर के बाद भी वह भाजपा को एकतरफा जीत दिलाने में कामयाब रहे है। इसके दो पॉइंट पर समझिए निजी प्रतिष्ठा की लड़ाई: यह चुनाव स्थानीय विधायक और पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा के लिए साख का सवाल था। सुधीर शर्मा का व्यक्तिगत और स्थानीय राजनीतिक आधार अब पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में स्थानांतरित हो चुका है। अदृश्य एंटी-इंकंबेंसी: शहर में वर्तमान प्रदेश कांग्रेस सरकार के खिलाफ एक अदृश्य लहर देखने को मिली, जिसका सीधा और बड़ा फायदा भाजपा को मिला।
कांग्रेस की हार और भाजपा की जीत के बड़े कारण गुटबाजी और बागी सुर: कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा कारण टिकट वितरण को लेकर पार्टी के भीतर उपजा असंतोष रहा। कई वार्डों में कांग्रेस के ही बागी नेताओं ने चुनाव लड़कर अधिकृत उम्मीदवारों का खेल बिगाड़ दिया। इसके विपरीत, भाजपा ने जमीनी स्तर पर बेहतर तालमेल दिखाया और बगावत को समय रहते शांत कर लिया। रणनीति का अंतर: कांग्रेस जहां केवल अपनी सत्ता के दम पर विकास के वादे कर रही थी, वहीं भाजपा ने अपने ‘पन्ना प्रमुख’ और बूथ स्तर के संगठन को पूरी ताकत से मैदान में झोंक दिया था, जो जमीन पर ज्यादा प्रभावी साबित हुआ। इसके साथ सत्ता के विरोधी वोटों को संगठित कर अपने पाले में लाने में भाजपा सफल रही। स्मार्ट सिटी के अधूरे वादों पर फूटा गुस्सा
धर्मशाला को कागजों पर ‘स्मार्ट सिटी’ का दर्जा तो मिल गया, लेकिन धरातल पर सीवरेज व्यवस्था की बदहाली, पार्किंग की भारी किल्लत, खस्ताहाल सड़कें और डंपिंग साइट जैसे बुनियादी मुद्दे आज भी जस के तस हैं। दो पूर्व मेयर व डिप्टी मेयर की हार सीधे तौर पर जनता के उस गुस्से को दर्शाती है जो वे लंबे समय से इन अधूरी नागरिक सुविधाओं को लेकर महसूस कर रहे थे। सुक्खू सरकार के लिए यह परिणाम एक बड़ी चेतावनी है कि शहरी इलाकों में उनका पारंपरिक वोट बैंक खिसक रहा है। देखिए जीत की तश्वीर

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