मंडी में हिंदू, बौद्ध और सिख धर्मों की साझा आस्था के केंद्र रिवालसर में भगवान बुद्ध की 2570वीं जयंती और गुरु पूर्णिमा का पर्व अपार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर रिवालसर की पवित्र झील के किनारे भक्ति, शांति और सांप्रदायिक सौहार्द का अद्भुत नजारा देखने को मिला। गुरु पद्मसंभव निंगमा गोम्पा कमेटी द्वारा आयोजित समारोह में एसडीएम बल्ह स्मृतिका नेगी व एसडीएम सुंदरनगर अमर नेगी ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। शुभारंभ बुद्ध वंदना और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए एसडीएम स्मृतिका नेगी ने कहा कि भगवान बुद्ध के शांति और अहिंसा के संदेश आज के दौर में और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। बुद्ध के ‘चार आर्य सत्य’ और ध्यान पर चर्चा समारोह के दौरान पलजुंग मठ के आचार्य पेमा नेगी ने भगवान बुद्ध के जीवन दर्शन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बुद्ध द्वारा प्रतिपादित चार आर्य सत्य और ध्यान की पद्धतियां मनुष्य को दुखों से मुक्ति दिलाकर आंतरिक शांति का मार्ग दिखाती हैं। कार्यक्रम में विशेष ध्यान सत्र और धार्मिक प्रवचनों का भी आयोजन किया गया।
‘त्सो-पेमा’ में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब रिवालसर झील, जिसे बौद्ध परंपरा में ‘त्सो-पेमा’ (कमल का सरोवर) कहा जाता है, में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखी गईं। मान्यता है कि गुरु पद्मसंभव, जिन्हें ‘दूसरा बुद्ध’ माना जाता है, इसी झील के कमल से प्रकट हुए थे। श्रद्धालुओं ने पवित्र झील की परिक्रमा की और सुख-समृद्धि की कामना की। गुरु पद्मसंभव की प्रतिमा के सम्मुख पूजा-अर्चना की। झील के किनारों पर हजारों दीप प्रज्वलित कर वातावरण को प्रकाशमय कर दिया। विविध आस्थाओं का संगम गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बौद्ध अनुयायियों के साथ-साथ हिंदू श्रद्धालुओं ने भी गुरु व्यास (मार्कंडेय ऋषि) मंदिर में माथा टेका। रिवालसर की यह भूमि एक बार फिर साबित हुई कि यहाँ अलग-अलग धर्मों की धाराएं एक ही शांति के सागर में आकर मिलती हैं। पूरे क्षेत्र में दिन भर प्रार्थनाओं और मंत्रोच्चार की गूँज सुनाई देती रही।