हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार लोकप्रियता की कसौटी पर कितना खरा उतरी है, इसका अंदाजा 31 मई को होगा, जब चार नगर निगम के रिजल्ट आएंगे। दिसंबर 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हो रहे सोलन, धर्मशाला, मंडी और पालमपुर निगम चुनाव कांग्रेस सरकार के लिए एक कठिन राजनीतिक परीक्षा माने जा रहे हैं। यही वजह है कि इन चुनावों को सत्ता का “सेमीफाइनल” कहा जा रहा है। हालांकि, पंचायत चुनावों को लेकर सत्तारूढ़ कांग्रेस बेफिक्र नजर आ रही है, क्योंकि ये पार्टी चिन्ह पर नहीं होते, लेकिन पार्टी चिन्ह पर होने वाले नगर निगम चुनाव कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए अहम हैं। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू यह दावा करते रहे हैं कि उनकी सरकार ने दिसंबर 2022 के विधानसभा चुनाव में दी सभी गारंटियां पूरी कर ली है। इनमें महिलाओं को 1500 रुपए की आर्थिक सहायता, पांच लाख रोजगार सृजन और पुरानी पेंशन योजना की बहाली जैसे अहम वादे शामिल हैं। अब नगर निगम चुनाव के नतीजे बताएंगे कि जनता वास्तव में इन नीतियों और दावों से कितनी संतुष्ट है। 2021 के चुनाव में कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा राजनीतिक समीकरणों पर नजर डालें तो वर्ष 2021 के चुनाव परिणामों में कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा था। चार नगर निगमों में से धर्मशाला, पालमपुर और सोलन पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया था, जबकि मंडी नगर निगम पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा रहा। BJP एंटी-इनकंबेंसी को भुनाने में जुटी दूसरी ओर, भाजपा इस चुनाव को पूरी तरह से एंटी-इनकंबेंसी के मौके के रूप में देख रही है। साढ़े तीन साल के कांग्रेस शासन के बाद विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी और विकास कार्यों की धीमी गति जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहा है। भाजपा का फोकस यह साबित करने पर है कि शहरी मतदाता सरकार के प्रदर्शन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। कांग्रेस जीती तो सुक्खू सरकार के पॉजिटिव नैरेटिव होगा नगर निगम चुनावों की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह केवल स्थानीय सत्ता का प्रश्न नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक दिशा तय करने वाला संकेतक भी माना जा रहा है। यदि कांग्रेस इन चुनावों में मजबूत प्रदर्शन करती है तो यह सुक्खू सरकार के लिए पॉजिटिव नैरेटिव को और मजबूती देगा। वहीं किसी भी तरह की कमजोर स्थिति विपक्ष को सरकार के खिलाफ बड़ा राजनीतिक हथियार उपलब्ध करा सकती है। कुल मिलाकर, सोलन, धर्मशाला, मंडी और पालमपुर के नगर निगम चुनाव अब सिर्फ स्थानीय निकाय की लड़ाई नहीं रह गए हैं, बल्कि यह तय करेंगे कि सुक्खू सरकार का साढ़े तीन साल का रिपोर्ट कार्ड जनता की नजर में कितना मजबूत है और हिमाचल की सियासत किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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