विश्व प्रसिद्ध त्रिउंड ट्रैकिंग रूट पर अब पर्यटकों और स्थानीय लोगों को शुल्क चुकाना होगा। वन विभाग ने इस रूट पर आवाजाही के लिए प्रति व्यक्ति 200 रुपये का पंजीकरण शुल्क अनिवार्य कर दिया है। नियम का उल्लंघन करने पर 5,000 रुपये का भारी जुर्माना लगाया जाएगा। विभाग ने नियम को सख्ती से लागू करने के लिए त्रिउंड की ओर जाने वाले चारों मुख्य रास्तों पर कर्मचारी तैनात किए हैं। यह नया फैसला उन निर्वासित तिब्बतियों को भी प्रभावित करेगा जो 1960 से मैक्लोडगंज और आसपास के क्षेत्रों में रह रहे हैं। ये लोग दशकों से इस शांत क्षेत्र का उपयोग ध्यान साधना और आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए करते आए हैं। अब उन्हें भी हर बार ऊपर जाने के लिए शुल्क देना होगा। भागसुनाग के स्थायी निवासी और प्रसिद्ध पर्यावरणविद पुरुषोत्तम नैहरिया ने सरकार तथा प्रशासन के इस कदम की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने सवाल उठाया है कि जब विभाग ट्रैकिंग रूट पर बुनियादी सुविधाएं देने में विफल रहा है, तो फिर किस बात का शुल्क लिया जा रहा है। खुले में शौच और कूड़ा प्रबंधन न होने से प्रदूषण नैहरिया ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रतिदिन सैकड़ों पर्यटक त्रिउंड पहुंचते हैं, लेकिन वहां शौचालय और कूड़ा प्रबंधन की कोई व्यवस्था नहीं है। इस कारण लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं, जिससे क्षेत्र के प्राकृतिक जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। ये जल स्रोत स्थानीय जनता की जीवन रेखा हैं और इनके दूषित होने से स्वास्थ्य संकट पैदा हो सकता है। सफाई व्यवस्था की बजाये प्रवेश शुल्क लगाया नैहरिया का तर्क है कि सरकार को जल स्रोतों को बचाने और सफाई व्यवस्था दुरुस्त करने पर पहल करनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय केवल प्रवेश शुल्क लगा दिया गया है। स्थानीय पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों का मानना है कि इस फैसले से ट्रेकिंग और गाइड जैसे व्यवसायों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और धर्मशाला आने वाले पर्यटकों की संख्या में भी गिरावट आ सकती है, जिससे रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे।