किन्नौर जिला आधुनिकता के दौर में भी अपनी सदियों पुरानी संस्कृति को सहेज कर रखे हुए है। जहां कई लोक कलाएं विलुप्त हो रही हैं, वहीं किन्नौर के कई गांवों में पारंपरिक नृत्य की परंपरा आज भी जीवंत है। जिले के मूरंग गांव में महाशिवरात्रि के समापन के बाद विशेष रूप से कोटिक्सा नृत्य का आयोजन किया जा रहा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह नृत्य न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह क्षेत्र की खुशहाली और बेहतर फसल की कामना के लिए देवी-देवताओं को प्रसन्न करने का एक माध्यम भी है। इस उत्सव में स्वांग नृत्य प्रमुख आकर्षण का केंद्र होता है, जो अन्य लोक नृत्यों से भिन्न है। युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है बता दे कि इस सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। युवा वर्ग अपने बुजुर्गों के साथ मिलकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। गांव के बुजुर्ग जहां स्वांग नृत्य की बारीकियों से अवगत कराते हैं, वहीं युवा कलाकार इसे नई ऊर्जा के साथ प्रस्तुत करने के लिए तत्पर हैं। नृत्य दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है ढोल और नगाड़े की थाप पर आयोजित होने वाला यह नृत्य दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है और क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को सजीव कर देता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह उनके लिए केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि उनकी पहचान है। स्वांग के माध्यम से वे अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और पूर्वजों के संस्कारों से जोड़ते हैं। सदियों पुरानी संस्कृति को सहेजे युवा स्वांग नृत्य में कलाकार रामायण, महाभारत या स्थानीय लोककथाओं के पौराणिक और ऐतिहासिक पात्रों का रूप धारण करते हैं, जिससे ये गाथाएं जीवंत हो उठती हैं। इसे बहुरूपिया कला के रूप में भी जाना जाता है, जहां कलाकार भारी-भरकम पारंपरिक वेशभूषा और हाथ से बने लकड़ी के मुखौटे पहनकर अभिनय करते हैं।