केंद्र सरकार रविवार को संसद में अगला आम बजट पेश करेगी। इस बजट में रेल बजट भी शामिल होगा। हिमाचल प्रदेश को उम्मीद है कि इस बजट में राज्य की मांगों पर ध्यान दिया जाएगा और उसे विशेष राहत मिल सकेगी। केंद्रीय बजट से पहले, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने दिल्ली में केंद्रीय वित्त मंत्री से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने हिमाचल प्रदेश से संबंधित चार प्रमुख मुद्दे उठाए थे। इन मुद्दों में राजस्व घाटा अनुदान, ऋण सीमा में वृद्धि, ग्रीन फंड का प्रावधान और आपदा राहत पैकेज शामिल हैं। राज्य के लिए एक चुनौती यह भी है कि 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई हैं। हालांकि, आयोग की रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी जा चुकी है और वर्तमान में वित्त मंत्रालय के पास है। मुख्यमंत्री सुक्खू ने वित्त मंत्री से पहाड़ी राज्यों के लिए विशेष प्रावधानों की जोरदार मांग की है, जिससे यह बजट राज्य के लिए और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
केंद्र के समक्ष उठाई हिमाचल की प्रमुख मांगें
1. राजस्व घाटा अनुदान बढ़ाने की मांग
मुख्यमंत्री ने केंद्रीय वित्त मंत्री से आग्रह किया कि हिमाचल के राजस्व घाटा अनुदान को कम से कम 10,000 करोड़ प्रति वर्ष तय किया जाए, ताकि राज्य की वित्तीय चुनौतियों से निपटा जा सके। राजस्व घाटा अनुदान वह राशि होती है, जो केंद्र राज्य के राजस्व खर्च और प्राप्ति के बीच के अंतर को पूरा करती है।
2. पहाड़ी राज्यों के लिए अलग ग्रीन फंड
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल जैसे हिमालयी राज्यों को पर्यावरण संरक्षण, जंगल, पारिस्थितिकी और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी है। इसीलिए पहाड़ी राज्यों के लिए वार्षिक 50,000 करोड़ का ग्रीन फंड बनाया जाए, ताकि पर्यावरण मित्र और हरित पहाड़ी विकास कामों को वित्तीय सहायता मिल सके।
3. आपदा जोखिम के लिए अलग आवंटन
सीएम सुक्खू ने कहा कि हिमालयी इलाके प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं, इसलिए डिज़ास्टर रिस्क इंडेक्स को हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों के लिए अलग बनाया जाना चाहिए और बजट में उसके लिए विशेष संसाधन दिए जाने चाहिए। वर्तमान में इसमें सुनामी, भूकंप में ज्यादा लाभ है, बाढ़ का कम।
4. लिमिट से अतिरिक्त लोन की अनुमति
हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति को देखते हुए सीएम ने अनुरोध किया है कि सकल घरेलू उत्पाद का अतिरिक्त दो फीसदी तक उधार लेने की अनुमति दी जाए, जिससे विकास परियोजनाएं और बुनियादी ढांचे के काम तेजी से हो सकें। यह लिमिट एफआरबीएम एक्ट के कारण तय हुई है, जिसका पालन राज्यों को करना होता है। आपदा में नुकसान से लोन कम पड़ रहा है।