हिमाचल प्रदेश के पर्यटन इतिहास में शुक्रवार को एक नया अध्याय जुड़ गया। केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश (CUHP) में इंडियन टूरिज्म एंड हॉस्पिटैलिटी कांग्रेस (ITHC) की 16वीं अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस का शुभारंभ हुआ। तीन दिवसीय वैश्विक सम्मेलन धारकंडी को एक नया दर्जा दिलाएगा। विशेषज्ञों ने कहा कि हमें पर्यटन के लिए नए डेस्टिनेशन विकसित करने चाहिए, जिनमें भोजन, शिल्प कला और स्थानीय व्यवस्था शामिल हो सकती है। हिमाचल में पहले से बने पर्यटन स्थल भीड़ से जूझ रहे हैं। कई ऐसे स्थान हैं जहां की प्रकृति ही नहीं, संस्कृति भी लोगों को आकर्षित कर सकती है। हिमाचल अनुभववादी पर्यटन की मिशाल विशेषज्ञों का मानना है कि हिमाचल के पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्र गुणवत्तापरक, स्थायी एवं अनुभववादी पर्यटन की नई मिसाल कायम कर सकते हैं। कुलपति बंसल के अनुसार, यह आयोजन मात्र शैक्षणिक गतिविधि नहीं है, बल्कि हिमालयी पर्यटन को ‘हरित भविष्य’ और स्थानीय संस्कृति व परंपरा के नवाचार के साथ आगे बढ़ाने का अभियान है। पर्यटन के लिए नए डेस्टिनेशन तलाशना जरूरी विश्वविद्यालय के कुलपति एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष ITHC, प्रो. (डॉ.) सत प्रकाश बंसल ने उद्घाटन सत्र में कहा कि हिमाचल में टूरिज्म का मतलब सिर्फ शिमला, धर्मशाला या मनाली नहीं है, जो पहले ही भीड़ से जूझ रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि हम नई डेस्टिनेशन खोजें और स्थानीय संस्कृति का महत्व बढ़ाएं। उन्होंने कहा, “अगर पर्यटक कांगड़ा घूमने आए और उन्हें होम स्टे में ‘कांगड़ी धाम’ सहित स्थानीय व्यंजन व संस्कृति का स्वाद न मिले, तो पर्यटन का औचित्य ही खत्म हो जाएगा।” सम्मेलन का फोकस ‘सतत पर्यटन और वेलनेस’ है। वोकल फॉर लोकल को मिलेगा बल यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिशन LiFE, कार्बन-न्यूट्रल हिमालय व हरित विकास नीति से प्रेरित है। मिशन LiFE के तहत सम्मेलन जिम्मेदार यात्रा, स्थानीय हस्तशिल्प, प्लास्टिक-प्रयोग में कमी, जैव विविधता के सम्मान जैसे विषयों को बढ़ावा देता है। सम्मेलन सचिव प्रो. सुमन शर्मा ने बताया कि इस बार प्रतिभागियों को बोह–सल्ली घाटी में ग्रामीण जीवन और जैविक भोजन का अनुभव कराया जाएगा, जिससे ‘वोकल फॉर लोकल’ को बल मिलेगा। सम्मेलन को ग्लोबल स्तर पर ICSSR और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, वाशिंगटन डीसी का भी शैक्षणिक समर्थन मिला है।

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