हिमाचल प्रदेश में पंचायतों के पुनर्गठन (री-ऑर्गेनाइज) के लिए पंचायतीराज एवं ग्रामीण विकास विभाग को 23 प्रस्ताव मिले है। पंचायतीराज विभाग ने शिमला, कांगड़ा, कुल्लू और मंडी जिला के डीसी से मिले इन प्रस्ताव को एग्जामिन करने के बाद प्रदेश सरकार को भेज दिया है। अब, इस पर अंतिम फैसला सरकार को लेना है। हालांकि, स्टेट इलेक्शन कमीशन ने मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के एक क्लॉज को लागू कर पंचायतों और नगर निकायों की सीमाएं फ्रीज कर दी है। इससे, सरकार चाहकर भी पंचायतों का पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन (डिलिमिटेशन) नहीं कर पाएगी। मगर राज्य सरकार स्टेट इलेक्शन कमीशन के फैसले को पलटने के लिए कानूनी सलाह ले रही है। पहले सभी पंचायतों का पुनर्गठन किया जा चुका: कमीशन राज्य सरकार अभी पंचायतों पुनर्गठन चाह रही है। मगर इलेक्शन कमीशन इसके पक्ष में नहीं है, क्योंकि राज्य सरकार ने छह महीने पहले ही पंचायतों व नगर निकायों का पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन किया है। डिलिमिटेशन पूरा होने के बाद ही कमीशन ने वोटर लिस्ट बनाने का काम शुरू किया। अब तक 3577 में से 3548 पंचायतों में वोटर लिस्ट तैयार कर दी गई है। ऐसे में यदि दोबारा पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन किया गया तो वोटर लिस्ट दोबारा बनानी पड़ेगी, क्योंकि ऐसा करने से वार्ड की सीमाएं डिस्टर्ब हो जाती है। सिलसिलेवार पढ़े इलेक्शन कमीशन ने क्यों लगाई पुनर्गठन पर रोक स्टेट इलेक्शन कमिश्नर अनिल खाची ने सीमाएं फ्रीज करने की 5 वजह बताई राज्यपाल से डीसी की शिकायत कर सकता है इलेक्शन कमीशन इलेक्शन कमीशन द्वारा सीमाएं फ्रीज करने के बाद सरकार और कमीशन आमने-सामने आ गए हैं। जिलों के डीसी इलेक्शन कमीशन के ऑर्डर नहीं मान रहे। लिहाजा इलेक्शन कमीशन कांस्टीट्यूशनल हेड राज्यपाल के पास जा सकता है और डीसी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है। हालांकि, स्टेट इलेक्शन कमिश्नर के पास भी ऑर्डर की अवहेलना पर कार्रवाई करने की शक्तियां है। मगर मामला राज्य के 12 जिलों के डीसी से जुड़ा है। इसलिए, कमीशन भी ऐसे सख्त एक्शन से बच रहा है और राज्यपाल के ध्यान में मामला ला सकता है।