हिमाचल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड का सही इस्तेमाल न करने पर कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार को खुद नहीं पता कि बड़ी कंपनियों से CSR फंड लेना उसका कानूनी अधिकार और कर्तव्य है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आपदा राहत के लिए फंड जुटाने की जिम्मेदारी सरकार की है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे राज्य सरकार ‘सो’ रही थी। कोर्ट का फैसला सरकारी कोष से मोटी तनख्वाह ले रहे उन एडवाइजर और नौकरशाहों की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्न चिन्ह है। कोर्ट ने कहा कि सरकार को यदि कानून का पता होता तो बड़ी कंपनियों से आपदा के बाद राहत एवं बचाव कार्य के लिए करोड़ों रुपए CSR फंड से इस्तेमाल हो सकते है। PIL सुनवाई में कोर्ट में क्या हुआ… CSR फंड को लेकर कोर्ट ने क्या कहा कोर्ट ने कहा कि CSR कानून में साफ लिखा है कि बड़ी कंपनियां अपने मुनाफे का 2% समाज के हित में खर्च करेंगी। यह पैसा आपदा राहत जैसे कामों में भी लगाया जा सकता है। मगर हिमाचल सरकार ने ऐसी किसी कंपनी से योगदान नहीं मांगा। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि किन कंपनियों ने CSR के तहत योगदान दिया और किन्होंने नहीं, इसका पूरा ब्यौरा पेश किया जाए। टिप्पणी का क्या होगा असर? हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद सरकार अब राज्य में काम करने वाली बड़ी कंपनियों से CSR के तहत आपदा राहत और पुनर्वास कार्यों के लिए फंड जुटा सकती है। इससे आपदा प्रबंधन को मजबूती मिलेगी और भविष्य में राज्य को राहत कार्यों के लिए केंद्र पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। साथ ही, यह आदेश आने वाले समय में अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है कि CSR फंड का इस्तेमाल केवल औपचारिकता न रह जाए, बल्कि समाज और राज्य की ज़रूरतों के अनुसार किया जाए। विधि सचिव की तैनाती में बदलाव पर जताई नाराजगी कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार के पास न तो दूरदर्शिता है और न ही सही कानूनी सलाह। कोर्ट ने विधि सचिव (लीगल रिमेंबरेंसर-कम-प्रिंसिपल सेक्रेटरी) की तैनाती में बार-बार हुए बदलाव पर भी नाराजगी जताई। चीफ जस्टिस ने कहा, ‘राज्य सरकार की यह हालत बताती है कि प्रशासनिक फैसले बिना समझदारी और दूर की सोच के लिए लिए जा रहे हैं। कोर्ट को इससे ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है।

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