हिमाचल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा- न्यायपालिका के लिए आवंटित बजट न मिलने से अदालतों का सामान्य कामकाज बाधित हो रहा है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि वित्त सचिव खुद 10 करोड़ रुपए का ड्राफ्ट लेकर 13 नवम्बर को अदालत में पेश हों। अन्यथा सरकार के खिलाफ कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट की कार्यवाही शुरू की जाएगी। यदि राशि जमा कर दी जाती है तो वित्त सचिव की उपस्थिति आवश्यक नहीं। इस मामले में हाईकोर्ट ने खुद 2023 में जनहित याचिका मानते हुए सुओ मोटो लिया था। कोर्ट ने कहा- रिटायर जस्टिस और अदालतों के प्रशासनिक खर्चों के भुगतान में निरंतर देरी की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही निर्देश दे रखा है कि रिटायर्ड जजों को आंध्र प्रदेश मॉडल के अनुसार भुगतान किया जाए। इसके हिसाब से वित्तीय लाभ 1 अक्टूबर 2014 से मिले। मगर हिमाचल सरकार ने यह भुगतान 14 मई 2025 की अधिसूचना से आगे लागू किया, जिससे पूर्व अवधि का भुगतान अधर में लटक गया। सरकार ने हाईकोर्ट को करना है 10 करोड़ का भुगतान अदालत ने पाया कि हाईकोर्ट को आवंटित धनराशि नहीं मिल रही है। लगभग ₹6.88 करोड़ का बकाया केवल प्रशासनिक खर्चों पर है, जबकि ₹4.07 करोड़ की राशि नए वाहनों की खरीद के लिए लंबित है। कुल मिलाकर ₹10 करोड़ से अधिक का भुगतान राज्य सरकार से बकाया है। कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने 7 नए जिला न्यायाधीशों और 39 सिविल जजों की अदालतों की स्थापना के प्रस्ताव पर भी कार्रवाई नहीं की है। वित्त विभाग हर बार “वित्तीय संसाधन नहीं हैं” कहकर इनकार कर देता है। AG बोले- सीएम को निर्णय लेने का अधिकार हिमाचल के चीफ जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस रंजन शर्मा की बैंच ने यह मामला सुना। राज्य सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल अनूप रत्न पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया- मामला संवेदनशील होने के कारण अब सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू को निर्णय को बोल दिया गया है। इस मामले में हाईकोर्ट ने सीनियर एडवोकेट नीरज गुप्ता को न्यायिक सहायक (अमिकस क्यूरी) नियुक्त किया हैं, उन्होंने राज्य के तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि सरकार लगातार सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर रही है। उन्होंने बताया कि अदालत ने कहा कि सरकार ने खुद तो मंत्री-विधायकों की सैलरी बढ़ा दी है और दूसरे विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों के वित्तीय लाभ देय है। कोर्ट का सख्त आदेश कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि न्यायपालिका के खर्चों को रोकना न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप है, जो कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट, 1971 की धारा 2(c), 2(i) और 3(i) के तहत दंडनीय अपराध है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार की लापरवाही अदालत की रोजमर्रा की कार्यवाही और न्याय प्रशासन को प्रभावित कर रही है। इस आदेश के दूरगामी असर होंगे राज्य सरकार को न्यायपालिका के लिए बजट आवंटन पर पारदर्शी नीति बनानी होगी, ताकि लंबित वेतन, चिकित्सा और भत्तों के भुगतान समय पर सुनिश्चित बनाया जा सके। ऐसा नहीं किया गया तो सरकार और न्यायपालिका के बीच तनाव और गहराएगा।