(रिपोर्ट-विनोद कुमार)–कुल्लू, 21 अगस्त। महाविद्यालय कुल्लू में लिटरेरी सोसायटी पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें प्रधानाचार्या डॉ. बंदना वैद्य ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की तथा दीप प्रज्जलित कर कार्यक्रम का आगाज किया। साहित्यिक समाज पर आयोजित इस कार्यक्रम का पहला पडाव संस्वती वंदना से आरंभ किया गया। खुशबू भारद्वाज व उनकी सहेलियों ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर कार्यक्रम को आरंभ करने का संदेश दिया। तत्पश्चात लिटरेरी सोसायटी की अध्यक्षा प्रो. नीरज कपूर ने मुख्यातिथि व कार्यक्रम में पधारे अन्य अतिथियों का परंपरा अनुसार स्वागत किया। इस मौके पर सोसायटी की अध्यक्षा कॉलेज के सभागार में उपस्थित छात्र-छात्राओं तथा अध्यापक वर्ग को ने हिन्दी साहित्य पर संबोधित करते हुए कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता कि चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरुप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना साहित्य का इतिहास कहलाता है। वहीं प्रो. नीरज कपूर ने बताया कि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का मत था कि साहित्य का इतिहास ग्रंथों और ग्रंथकारों के उद्भव और विलय की कहानी नहीं है वह काल स्रोत में बहे आते हुए जीवंत समाज की विकास कथा है। उन्होंने कहा कि इन दोनों मूर्धन्य विचारकों की परिभाषा से स्पष्ट है कि साहित्य जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिंब है। चित्तवृत्तियां समय और काल के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। अतएव साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता रहता है। महाविद्यालय कुल्लू में लिटरेरी सोसायटी कार्यक्रम में साहित्य के अलावा अन्य गतिविधियों पर भी विद्यार्थियों ने भाग लिया। इस दौरान प्रश्नोतरी, भाषण, काव्य गायन, पेंटिंग पोस्टर मेकिंग, कार्टून मेकिंग तथा कोलाज मेकिंग में विद्यार्थियों ने अपने हुनर का खूब प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में जहां महाविद्यालय के इन विद्यार्थियों ने साहित्य को जाना वहीं इन सभी आयोजित प्रतियोगिताओं में अव्वल रहने के लिए खूब मेहनत भी की। लिटरेरी सोसायटी कार्यक्रम में बच्चों के बीच डिवेट भी करवाई गई जिसमें सभी ने अपने विचारों को प्रदर्शित करते हुए बहस का दौर जारी रखा। विद्यार्थियों ने डिवेट में कहा कि परिस्थितियों के आलोक में साहित्य की इस विकासशील प्रवृत्ति को प्रस्तुत करना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है। साहित्य का विश्लेषण अध्ययन केवल साहित्य एवं साहित्यकार तक सीमित रखकर नहीं किया जा सकता। साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों की प्रस्तुति के लिए उससे संबधिंत राष्ट्रीय परम्पराओं, सामाजिक परिस्थितियों, आर्थिक परिस्थितियों उस युग की चेतना, साहित्यकार की प्रतिभा तथा प्रवृत्ति का विश्लेषण आवश्यक है। बहस-बाजी में इन विद्यार्थियों ने एक-दूसरे को जानकारी में बताया कि हिंदी साहित्य ने अपने चैदह सौ वर्षों के लंबे इतिहास में अनेक रत्न प्रस्तुत किए हैं और उसके अनेक आयाम हैं। गद्य, पद्य, निबंध,
नाटक, उपन्यास कहानियां इत्यादि। हिंदी आज केवल राष्ट्रभाषा ही नहीं, भारत के हिंदीतर क्षेत्रों में और विदेशों में भी अधिकाधिक पढ़ाई जा रही है और धीरे-धीरे एक विश्वभाषा का रूप धारण करती जा रही है। लिटरेरी सोसायटी कार्यक्रम पर महाविद्यालय कुल्लू के जे एंड एमसी के विद्यार्थियों विशाल, रितिक, विनोद व अनुरंजनी गौतम ने सुंदर रिपोर्ट भी तैयार की तथा महाविद्यालय के दिनेश, किरण, होतमे राम, राजेश्वरी, कुसुम, अंकिता, ईशिता, दिव्यांगना, प्रीति, नितिन, तेजवंती, शालू, शिल्पा, दुनीचंद, सुलोच, सृष्टि, अवंतिका, मुरारी, किरण सोनी, सोनिया ठाकुर, युक्ता, मनोज, राधिका गोयल, यामिनी ठाकुर व अन्य छात्र-छात्राओं ने विभिन्न आयोजित प्रतिस्पर्धाओं में अपने हुनर का परिचय दिया।

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